क्या गिला करें हम अपने मासूम यार का।
किस किस से छिपायें नाम नादाँ यार का।
जिनके लिए बदनाम हुए, वो किस्से हमारे आम करे जाते हैं
कोई तो सिखाओ यारों उन्हें सलीका इश्क के इज़हार का ।
जिस पर भरोसा किया, उन्होंने ही तमाशा बनाया प्यार का
उम्र हुई न जाने कब आयेगा अब ये मौसम ऐतबार का ।
बहुत बेंचे हैं ख्याब उन्होंने, पल भर के खुलूस की खातिर
कौन जाने वो कब बंद करेंगे धंधा दिलों के कारोबार का ।
निगाहे यार नश्तर है और हुस्न औ'अदा खंजर उनके ,
हँसकर सहते हैं जुल्म, क्या शिकवा करें उनके वार का ।
लगकर मेरे सीने से कहते हैं वो उन्हें इश्क नहीं मुझसे ,
या खुदा क्या जालिम हैं ये अंदाज़ उनके इकरार का ।
रकीबों के इस शहर में सबकी हैं हर किसी से अदावत
कौन सुनेगा 'दास्ताँ' तेरा ये किस्सा पुराना प्यार का ।
हां कभी-कभी ज़रूर लगता है कि शहर मे कोई भी भरोसे का नही है।बढिया लिखा आपने।
ReplyDeleteबढ़िया है.
ReplyDeleteबहुत खूब । आभार ।
ReplyDeleteरकीबों के इस शहर में सबकी हैं हर किसी से अदावत
ReplyDeleteकौन सुनेगा 'दास्ताँ' तेरा ये किस्सा पुराना प्यार का ।
बहुत सुन्दर!
बधाई!
बहुत बेंचे हैं ख्याब उन्होंने, पल भर के खुलूस की खातिर
ReplyDeleteकौन जाने वो कब बंद करेंगे धंधा दिलों के कारोबार का ।
बहुत सुन्दर!
बधाई
लाजावाब गज़ल है ये शेर बहुत पसंद आये
ReplyDeleteबहुत बेंचे हैं ख्याब उन्होंने, पल भर के खुलूस की खातिर
कौन जाने वो कब बंद करेंगे धंधा दिलों के कारोबार का ।
निगाहे यार नश्तर है और हुस्न औ'अदा खंजर उनके ,
हँसकर सहते हैं जुल्म, क्या शिकवा करें उनके वार का ।
बहुत बहुत शुभकामनायें
wah is baar to aapka tashan hi different hai... gazal ki creativity first time padhne ko mili . good one
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