प्यारे पथिक

जीवन ने वक्त के साहिल पर कुछ निशान छोडे हैं, यह एक प्रयास हैं उन्हें संजोने का। मुमकिन हैं लम्हे दो लम्हे में सब कुछ धूमिल हो जाए...सागर रुपी काल की लहरे हर हस्ती को मिटा दे। उम्मीद हैं कि तब भी नज़र आयेंगे ये संजोये हुए - जीवन के पदचिन्ह

Tuesday, February 16, 2010

कैसे सरेआम कर दूं तेरे कांधे के बोसे को




हैं कई इल्जाम मुझ पर यूँ तो चुप रहने को
कैसे सरेआम कर दूं तेरे कांधे के बोसे को

कुछ तो बरकत मिली होगी  भूखे पेट सोने से 
वैसे तो मोमिन कहता है, कई रोज़ हैं रोजे को

चाक-जिगर है पर, दुनियादारी भी तो ज़रूरी
रोऊंगा मैं, खाली ही रखना एक तन्हा गोशे को  

मुफलिसी में करता हूँ हक-ए-मजलूम की बातें
कौन सिखाये दस्तूर-ए-ज़माना मुझ सरफरोशे को

हुस्न वालों पर एतबार से 'दास्ताँ' डरना कैसा
अपने क्या कम हैं, तोड़ते तेरे दिल-भरोसे को

9 comments:

  1. मुफलिसी में करता हूँ हक-ए-मजलूम की बातें
    कौन सिखाये दस्तूर-ए-ज़माना मुझ सरफरोशे को


    -बेहतरीन!!

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  2. कुछ तो बरकत मिली होगी भूखे पेट रहने से
    वैसे तो मोमिन कहता है, कई रोज़ हैं रोजे को
    बहुत खूबसूरत शेर

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  3. चुप रहने को कई इल्जाम हैं ...
    भाव पूर्ण ग़ज़ल .. !!

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  4. बहुत खूब शुक्रिया इसको पढवाने के लिए

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  5. बहुत बेहतर कहा जी आपने।

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  6. खूबसूरत ग़ज़ल.....बधाई

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  7. मुफलिसी में करता हूँ हक-ए-मजलूम की बातें
    कौन सिखाये दस्तूर-ए-ज़माना मुझ सरफरोशे को
    लाजवाब । पूरी गज़ल बहुत अच्छी लगी । आशीर्वाद

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  8. मुफलिसी में करता हूँ हक-ए-मजलूम की बातें
    कौन सिखाये दस्तूर-ए-ज़माना मुझ सरफरोशे को ....bhai waah!

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