प्यारे पथिक

जीवन ने वक्त के साहिल पर कुछ निशान छोडे हैं, यह एक प्रयास हैं उन्हें संजोने का। मुमकिन हैं लम्हे दो लम्हे में सब कुछ धूमिल हो जाए...सागर रुपी काल की लहरे हर हस्ती को मिटा दे। उम्मीद हैं कि तब भी नज़र आयेंगे ये संजोये हुए - जीवन के पदचिन्ह

Tuesday, February 9, 2010

यह जवानी है मेरे दोस्त, इसे परदे क्या छिपाएं



नाकिस सा गुस्सा उसका, बड़ी भोली सी अदाएँ
यह जवानी है मेरे दोस्त, इसे परदे क्या छिपाएं

शिकवा उन्हें कि हिचकी नहीं आती, याद नहीं करते
कभी भूले ही नहीं जिसे, उसे कोई कैसे याद दिलाएं

कासिद के साथ ही आई थी कुछ भीगी सी फिजाएँ
खाली ख़त में  सब बयां कर गई तेरी अश्क  धाराएँ

होंगे आशिक़ कई जो सहते जुल्म-ओ-सितम तुम्हारे
पर होगा हम सा न कोई, जो हर जख्म पर दे दुआएँ

तेरे दो बूँद आसुओं के सैलाब से मर जाता 'दास्ताँ'
फिर क्यों हर शक्स तेरे शहर का है पत्थर उठाये 

13 comments:

  1. Waah! kya baat hai....bahut umda!!
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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  2. कभी भूले ही नहीं जिसे, उसे कोई कैसे याद दिलाएं
    वाह वाह!

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  3. होंगे आशिक़ कई जो सहते जुल्म-ओ-सितम तुम्हारे
    पर होगा हम सा न कोई, जो हर जख्म पर दे दुआएँ
    अन्दाजे बयाँ क्या कहने !!

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  4. ग़ज़ल क़ाबिले-तारीफ़ है।

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  5. नाकिस सा गुस्सा उसका, बड़ी भोली सी अदाएँ
    यह जवानी है मेरे दोस्त, इसे परदे क्या छिपाएं .nice

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  6. अन्दाजें बंया क्या खुब है
    शुभान अल्लाह

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  7. तेरे दो बूँद आसुओं के सैलाब से मर जाता 'दास्ताँ'
    फिर क्यों हर शक्स तेरे शहर का है पत्थर उठाये
    सुन्दर लगी पंक्तियां!

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  8. होंगे आशिक़ कई जो सहते जुल्म-ओ-सितम तुम्हारे
    पर होगा हम सा न कोई, जो हर जख्म पर दे दुआएँ

    तेरे दो बूँद आसुओं के सैलाब से मर जाता 'दास्ताँ'
    फिर क्यों हर शक्स तेरे शहर का है पत्थर उठाये
    सुधीर शब्द नही मिल रहे। बस निशब्द हूँ तुम्हारी हर रचना की तरह बेहतरीन बहुत बहुत शुभकामनाये? महाशिवरात्री की बधाइ

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