प्यारे पथिक

जीवन ने वक्त के साहिल पर कुछ निशान छोडे हैं, यह एक प्रयास हैं उन्हें संजोने का। मुमकिन हैं लम्हे दो लम्हे में सब कुछ धूमिल हो जाए...सागर रुपी काल की लहरे हर हस्ती को मिटा दे। उम्मीद हैं कि तब भी नज़र आयेंगे ये संजोये हुए - जीवन के पदचिन्ह

Tuesday, July 6, 2010

तेरी यादों की है रहमत, हम अकेले न होंगे


होगा यूँ भी ज़िन्दगी में कि ये मेले न होंगे
तेरी यादों की है रहमत, हम अकेले न होंगे

मिलेगा वो मुकाम कभी तो इश्क वालों को
ज़माने के हाथों में सिर तलाशते ढ़ेले न होंगे

दिल टूटने का दिलकश फ़साना अपना इश्क
चलेगा तब भी जब फुसफुसाते घरोंदे न होंगे

हो जवाँ मिल ही जायेंगे आशिक़ कई तुमको
करे इंतजार ताउम्र, ऐसे हमसे अलबेले न होंगे

करोगे तलाश कभी तो बुझते हुए चिरागों की
लौटते  दर पे हर मौसम फरेबी-सवेरे न होंगे

होगी महसूस तुम्हे भी ज़िन्दगी-भर की खलाएं,
होगी ग़ज़ल तेरे नाम, पर अहसास मेरे न होंगे

निभाता रह दास्ताँ तू रस्म-ए-मुहब्बत उम्रभर
होगी क़द्र जज्बातों की जब निशाँ तेरे न होंगे

6 comments:

  1. खूबसूरत पोस्ट

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  2. हो जवाँ मिल ही जायेंगे आशिक़ कई तुमको
    करे इंतजार ताउम्र, ऐसे हमसे अलबेले न होंगे

    Wah! Kya gazab gazal kahi hai!

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  3. होगी महसूस तुम्हे भी ज़िन्दगी-भर की खलाएं,
    होगी ग़ज़ल तेरे नाम, पर अहसास मेरे न होंगे

    निभाता रह दास्ताँ तू रस्म-ए-मुहब्बत उम्रभर
    होगी क़द्र जज्बातों की जब निशाँ तेरे न होंगे
    वाह जवाब नही ।सुधीर बहुत खूबसूरत गज़ल है। बधाई। कैसे हो?

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  4. प्रवाहों से लड़ता निरन्तर मैं जिनके,
    समय के थपेड़े वे झेले न होंगे ।

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  5. निभाता रह दास्ताँ तू रस्म-ए-मुहब्बत उम्रभर
    होगी क़द्र जज्बातों की जब निशाँ तेरे न होंगे

    bhavbhini shbda vyanjana.badhai

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