प्यारे पथिक

जीवन ने वक्त के साहिल पर कुछ निशान छोडे हैं, यह एक प्रयास हैं उन्हें संजोने का। मुमकिन हैं लम्हे दो लम्हे में सब कुछ धूमिल हो जाए...सागर रुपी काल की लहरे हर हस्ती को मिटा दे। उम्मीद हैं कि तब भी नज़र आयेंगे ये संजोये हुए - जीवन के पदचिन्ह
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Tuesday, November 2, 2010

ज़माना है



मेरे हालात पर क्यों हँसता ज़माना है
मेरा कातिल मेरा मुनसिब ज़माना हैं

हर गम-औ-ख़ुशी को बेबस अपनाना है
हाय! क्या बेदर्द यह दस्तूर-ए-ज़माना है

तन्हा सबको अपनी सलीबें खुद ही ढोना है
यूँ तो कहने को सबका हमदर्द ज़माना है

करके तौबा तेरे सजदे में सिर झुकाना है
इश्क-ए-इबादत को जुर्म कहता ज़माना हैं

तेरे मेरे नाम पर निकला इक फ़साना है
न छिपा अब जख्म, कुरेदेगा ज़माना है

तन्हाईयों में भी 'दास्ताँ' सलीके से रोना हैं
दिलजलों की आह को भी परखता ज़माना हैं

Wednesday, October 27, 2010

कभी तो मिलो मेरे ख्यालातों के मोड़ पर



हुआ अरसा, कभी तो मिलो  
मेरे ख्यालातों के मोड़ पर,
देखूँ, हैं कितना बदला तसब्बुर
जो रखा ख्याबों में जोड़ कर

है इल्म कि कुछ मुश्किल होगी
पर खाली हाथ नहीं आना,
इक्का-दुक्का ही सही -
वो तीखी तकरार छिपा लाना
(क्योंकि) बड़ा विराना हो चला है
तुम्हारे बिन इंतजार का ये आलम
थोडा फीका लगने लगा है  
मुझे, अपना दागदार दामन
यूँ तो चुप्पियाँ भी आकार
अब मुझको सदाएँ नहीं देती
भूले-भटके हुए फिकरों की भी
आहटें सुनाई नहीं देती

मैंने भी,
 रस्म-अदायगी  की खातिर
देने को बासी से उल्हाने  संजोये रखे हैं
तोहफे में कुछ बेमतलब शिकवे शिकायत
बेखुदी में पनपे कुछ ख्यालात
आँखों में पुडियाए रखे है
वैसे तो तुमसे कहने को
मेरे कुछ बेपर्दा हालात भी है
साथ में, जबावों के पते खोजते
कुछ गुमशुदा सवालात भी हैं

तुम मिलना जरूर , चाहे  
हमेशा की तरह कुछ भी न कहना,
अपनी उनीदी उन्मादी आँखों से
बस हर बात पे सवाल उठाते जाना
मेरे वजूद को होने का आसरा मिल जायेगा
और हाँ!! जाते जाते तुम
मेरी यें सर्द सिसकती आहें,
बची खुची सहमी कुचली सी सांसे
सब अपने आँचल में गठिया कर लेती जाना
मुझको जिन्दा रहने का बहाना मिल जायेगा!!

कभी तो मिलो तुम मेरे ख्यालातों के मोड़ पर !!

Tuesday, October 19, 2010

कुछ तो असर आहों में है

मित्रों, 
एक लम्बे  अंतराल के बाद आप सब से मुखातिब हूँ. इस बीच कुछ समय के लिए जननी और जन्मभूमि की चरण-रज लेने हेतु भारतवर्ष गया. अपने इस यात्रा में हमने अजंता-एल्लोरा और देवगिरी दुर्ग (दौलताबाद) की भव्य विथिकायों में भी रमण करने का अवसर प्राप्त हुआ. उनकी भव्यता और कलात्मकता  देखकर  ह्रदय  कई  दिनों  तक पाषाणों पर लिखे  उन रागों के अनुराग से विरक्त नहीं हो पाया और न जाने कितनी रचनाएँ पाषाणों से लेकर पत्थर, जीवन से लेकर निर्जन पर लिख डाली.  वापस आने के बाद भी कुछ समय गृहस्थी और दाल-रोटी के चक्कर में आप से वार्ता नहीं हो पाई. लेकिन अब हाजिर हूँ . आशा हैं आपका स्नेह सैदव की भांति मुझे मिलता रहेगा.
 सादर,
सुधीर



थी मेरी मंजिल वो पर अब किसी और की राहों में है
सुना है मेरी मुन्तजिर वो कुछ तो असर आहों में है

न मिटी खलिश कि मिट जाये दूरियाँ दिल की उनसे 
बिताई हमने सिमटकर उम्र जिनकी बेवफा बाँहों में है  

सुना न  ये किताबी बाते कुफ्र औ' क़यामत की वाइज
गुजारी कोई रात क्या तुने उन जुल्फों की पनाहों में है

गोया होगा कोई और भी चेहरा दिलकश चाँद-सितारों सा
हमे तो आरजू इतनी कि मिले वो चेहरा जो निगाहों में है

खो गए 'दास्ताँ' ज़माने कितने खोकर इश्क-ए-मंजिल
हुआ है शायर तू, ये कशिश इन कुरेदे हुए घावों में है

Wednesday, August 4, 2010

तुम्हारा नाम


बड़े छोटे से लगे दर्द अपने
जब चंद पन्नो पर
सिमट आये
कविता बनकर....

तेरी लटों में उलझे
वो तन्हा से ख्यालात,
तेरे बोसों से महके,
कुछ गुमनाम दिन-रात
कुछ कहे-अनकहे  से
मेरे दर्द और  जज्बात
वो सालों तक सताती रही
तेरी रुखसत की एक बात
वो मेरी उम्रदराज आरजू,
एक कशमकश, इंतजार
सब कुछ !!
बस चंद पन्नों पर
सिमट आया था

फिर एक नज़र में,
अपनी कविता लगने लगी..
ज़िन्दगी से बड़ी
आखिर कुछ अल्फाजों में सही 
किसी शख्स की थी उम्र पड़ी
कुछ आशाएं, कुछ निराशाएं
दिल की बोली कुछ नैन-भाषाएँ
कुछ पाने की चाह,
कुछ खोने की आह

अल्फाजों औ' सफों के दायरों से अलग
भावों औ' ज़ज्बातों से ऊपर
तेरे-मेरी कहानी के बंधन से अलग
इक जुस्तजू, इक धरोहर की
खुशबू की तरह रोशन
साँस लेती, जीती मरती इक कहानी
जो पनप रही थी
उन चंद पन्नों पर....

पर दोनों ही हालातों में ,
शिकवा तो वही था, जानम!
इस बेनाम साझी सी कहानी की
हर लाइनों की तहों में,
जबकि एहसास सिर्फ तुम्हारा  था
लेकिन मेरी हाथ की रेखाओं की तरह
इस नज्म  में भी नदारत,
 नाम तुम्हारा था...

Saturday, July 10, 2010

तुम

मित्रों,
आज अपने विवाह की १०वी वर्षगांठ पर अपनी प्राण-प्रिया के लिए चंद पंक्तियाँ लिख रहा हूँ...मेरी हिंदी की डाक्टर साहिबा पत्नी को हो सकता है यें कविता काव्य-शास्त्रों के मापदंडों पर खरी न उतरती हुई प्रतीत हो... पर मैं इस सार्वजानिक मंच से बस इतना ही कहना चाहिंगा - यदि भावों की अभिव्यक्ति कविता है, यदि ह्रदय की टीस कविता हैं, यदि अव्यक्त अभिलाषाओं की बातें कविता हैं, तो प्रिय, फिर ये मेरे ह्रदय-उदगार भी कविता हैं....



तुम! तुम ही क्यों वो,
जो मेरे अंतः का हर स्पंदन,
बोली या सहमी हर धड़कन
ह्रदय की हर परिभाषा -
आशा या निराशा
यूँ खुली किताब सा पढ़ लेते हो
और वो सब, निःशब्द
बिना अलंकार, सज्जा-श्रृंगार
बिना किसी मिथक
हर भाव पृथक-पृथक
नैनों से कह देते हो

मुठ्ठी भर मुस्कान
कुछ आंसू जाने अनजान
कुछ सच्चाई  कुछ कडुवाहट
बिना शोर बिना शिकायत
सब कुछ!! बिना राग
जीवन  के भारी काव्य 
मेरे काँधों  पर सर रख
सांसों में गा लेते हो....

सुख-दुःख की बन्दर-बाट
पाप-पुण्य की बिछी बिसात
स्वप्नलोक के टूटे घट
अभिलाषाओं के प्यासे पनघट
सब भूला-
पीयुष घटा की प्रथम  फुहार  बन
आलिंगन में कस लेते हो...

तुम! तुम ही क्यों वो,
जो मेरे अंतः का हर स्पंदन,
बोली या सहमी हर धड़कन
यूँ खुली किताब सा पढ़ लेते हो

Tuesday, June 8, 2010

केहि बिधि मिट्टी से मिट्टी मिल जावे...

मित्रों,

ऐसे ही फुर्सत के कुछ लम्हों में एक ताल के किनारे बैठे हुए, मेरोरियल डे के दिन (मई ५, २०१०) चंद पंक्तियाँ मन में उपजी...उन्हें सूफियाना रंग और विस्तार  देकर प्रस्तुत कर रहा हूँ,  वैसे तो सूफी गीतों पर मेरी कोई पकड़ नहीं हैं पर फिर भी विश्वास है कि आप मेरी इस कोशिश को सदैव की भांति अपना स्नेह देंगे.
सादर,
सुधीर


कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे
दाग देय देंह को कोई, या मिट्टी में मिट्टी दबवाबे
पिया-मिलन की आस है, बाबुल के रिश्ते  बिसरावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

सुलगी जब नयनन की बाती, दहकी सांसों से छाती
बहुत जली पीहर मैं तो, विरह की तपन में मैं तो
कोई तो पिय को बतलावे, लेप-चंदन से मिट न पावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

पीहर के खेल-तमाशे, कुछ बाँधे कुछ समझ न आवे
पिय ने बिसरा मोको पर जियरा पिय को न बिसरावे
इक नेह की डोर से बँधे हैं कैसे कोई बंधन छुटबावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

जग की है रीति पुरानी, पीहर का कितना दाना पानी
पग-फेरे की बात थी अपनी, निठुर की देखो मनमानी
कैसे भूले वो प्रेम-कहानी, कोई तो उनको याद करावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे
दाग देय देंह को कोई, या मिट्टी में मिट्टी दबवाबे
पिया-मिलन की आस है, बाबुल के रिश्ते बिसरावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

Tuesday, June 1, 2010

उसका आया है ख़त कि भूल जाऊं उसे


आया है ख़त उसका कि अब भूल जाऊं उसे
ग़ज़ल न रही वो मेरी, अब न गुनगुनाऊ उसे

रहा यतीम ख्याल सुनहरा तेरे मेरे रिश्ते का
जब न कोई निस्बत तुझसे तो क्या अपनाऊँ उसे

उफ़क तक भी न पहुंचा अहसास अक़ीदत का
खौफज़दा सजदों का सच, मैं क्या बतलाऊँ उसे

बढ़ गया बहुत आगे वो लेकर नाम तिजारत का
दिल औ' जज्बातों की बात अब क्या समझाऊँ उसे

सच कहता है वो बनकर रहनुमा हम गरीबों का
हालात-ए-मुफलिसी बयाँ करके  क्यों झूठलाऊँ उसे

नाम न दे सके जिस अहसास को दुनियादारी का  
क्यों ज़रूरी हैं कि मैं किसी नाम से बुलाऊँ उसे 

हद-ए-आईने में कैद हैं एक शख्स दास्ताँ तुझ सा
छोड़े खामोशियों की चिलमन,  तो पहचान पाऊँ उसे

Saturday, May 22, 2010

सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं


सुलग कर रह गया चाँद फलक पर,
अंधियारी रातों में शोखियाँ चलती नहीं
मांग लेता खुदा से मैं भी तुझको पर,
सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं

क्या करता मैं नुमाइश इन ज़ख्मों की
मुर्दा-दिलों में टीस कोई उठती नहीं
दौड़ना रही मजबूरी मेरी उम्र भर
गिरे देवों के लिए भी भीड़ रूकती नहीं

हमदर्द तलाशता क्या इस शहर में
गैर के फ़सानों पर कोई रोता नहीं
तन्हाइयों से रहा खुद बतियाता मैं
दर्दीले नगमों पर कोई वक्त गँवाता नहीं

थी उम्मीद मुझे एक और मुलाकात की
सोची बातें हज़ार पर कहना आसाँ नहीं
हैं ज़ख्म इतने हैं अपने चाक जिगर पर
गैरों को दिखाना अब मुझे गंवारा नहीं

बहती रहीं आँखों से, चाह मिटती नहीं
क्यों कोशिशें तुझे भूलने की चलती नहीं
 मांग लेता खुदा से मैं भी तुझको पर,
सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं

Tuesday, April 27, 2010

दर्द-ए-दिल दिल तक ही रखूँ, यह ज़रूरी तो नहीं


दर्द-ए-दिल दिल तक ही रखूँ, यह ज़रूरी तो नहीं,
सरेआम रों दूँ, पर ऐसी भी मेरी मजबूरी  तो नहीं

ज़माने का दस्तूर निभाना, है हिदायत वाइज़  की
फिर मिलेगी जन्नत पर यह उम्मीद पूरी तो नहीं

डरता हूँ बेअदबी की तोहमत न दे मुझको  ज़माना
बस सच कहता हूँ, फितरत मेरी जी-हुजूरी  तो नहीं 

दर्द हद से गुजर गया होगा जर्ब चाक-जिगर का
आवाज भर्राई है पर ऑंखें उसकी सिंदूरी तो नहीं

खो गया कहीं रिश्ता हमारा वक्त की सियासत में
फिर भी पास है तू, एक हिचकी कोई दूरी तो नहीं

वो जाते जाते जिंदगी मेरी ख़लाओं से भर गया
शिकवा क्या करे दास्ताँ, जिंदगी अधूरी तो नहीं

Friday, April 9, 2010

पुरानी तस्वीर



कल पलटते उस पुरानी एल्बम के पन्ने -
फिर मिली एक तस्वीर पे, वो बेकरार शाम
कुछ शरारतें हमेशा की तरह मुठ्ठियों में भींचे
वो शोख चंचल आँखे कुछ मस्ती में नीचे खीचें
जुल्फे रब्त पर एक सवाल की तरह उलझी सी,
और एक लम्बी चुप्पी की सिरहन, ठंडी सी
जो उस पल से अब तलक चली आई थी

नावेल के मुड़े पेज की तरह, ज़िन्दगी 
अब भी किसी सफे पर बस रुकी सी लगी
बात तो कल की थी मेरे हमदम पर
कहानी अब तक चली सी लगी
यूँ लगा एक पल की कशमकश की सिलवट में
एक गुमशुदा सी जिंदगी बैठी हो जैसे
तुम आओ न आओ, पर ऐ खुदा!
इस पल पर मैं लौटाता रहूँ ऐसे ...

Tuesday, March 16, 2010

गम है कि जिन्दा हूँ, वरना खुशियों से तो मर जाता



गम है कि जिन्दा हूँ, वरना खुशियों से तो मर जाता
तनहाइयों ने थामे रखा, वरना जमाने में किधर जाता

सौ बार हुआ क़त्ल रहा फिर भी धड़कता मेरा दिल
माजी की थी चाहत नहीं तो इक झोके से बिखर जाता

न छिपा ज़ालिम पर्दों में यूँ, इस गुल-ए-हुस्न को अपने
होती हैं आफ़ताब आशिक़-निगाहें, पड़ती तो निखर जाता  

खुशनसीब हूँ मैं कि उसने  मुझसे इक रिश्ता तो बनाया
ज़फ़ा करके वो कायम है, वफ़ा करता तो मुकर जाता

दिल टूटा है होगा तूफां से तेरा सामना उम्रभर अब तो
ख्याब कोई टूटा होता तो मौसमी गुबार सा गुजर जाता

रहमत उसकी जो हँसकर दिल लगाया भी, मिटाया भी
मेरे दामन को वरना कोई कैसे इन गजलों से भर जाता

हुई हैं कामयाब दास्ताँ कुछ तो रकीबों की बाते वरना
तुझसे मिलकर वो मुस्कुराता सा चेहरा न उतर जाता

Tuesday, March 9, 2010

तेरे तसव्वुर से मैं कह पाता, मैं वो सब जो कहना भूल गया



तुम जाओगे तो क़यामत होगी, रुक जाओगे तो क़यामत होगी
हाय! इसी कशमकश में,  मैं तुझसे हाल-ए-दिल कहना भूल गया
काश थाम कर यादों का आइना, पलट कर कुछ वक्त के पन्ने,
तेरे तसव्वुर से मैं कह पाता, मैं वो सब जो कहना भूल गया

वो रब्त जिसे बाँध न पाए, तेरे मेरे नाम के कच्चे धागे
उसके सिरे थामे अपने कुछ उजडे सपने बांधा करता हूँ
खामोशियों की आड़ में ठंडी साँसों  में लपेटकर अब भी
हर गिरह पर तेरे नाम से गुमनाम रिश्ते बांधा करता हूँ

ज़रूरी तो नहीं ज़िन्दगी में,  हर सवाल का जवाब मिले
मुमकिन हैं कि सवाल के, जवाब में हमे इक सवाल मिले
फिर भी यह सोचकर गुज़रता हूँ मैं, तेरी रहगुजर से
किसी रोज़ तो तू भी मुझको, मुझसी ही हमख्याल मिले

इश्क एक अहसास दफ्न जो, कितने बेजुबां दिलों की तहों में
शब्द हैं दरकार इसको भी,  तभी  होता यह मुकम्मल पलों में
मालूम थी यें हकीकत मुझे फिर क्यों तुझसे कहना भूल गया 
ताउम्र इबादत की जिसकी दास्ताँ, उसके सजदे में रहना भूल गया
काश थाम कर यादों का आइना, पलट कर कुछ वक्त के पन्ने,
तेरे तसव्वुर से मैं कह पाता, मैं वो सब जो कहना भूल गया


विशेष: सभी गत सप्ताह सोमवार को होली के  कारण काव्य रचना से अवकाश रहा. क्षमा प्रार्थी हूँ और साथ ही सभी आदरणीय पाठकों एवं स्नेहीजन को (देर से ही सही)  होली की हार्दिक शुभकामनाएँ.  

Tuesday, February 2, 2010

अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित,

मित्रों,
कल अपने जन्मदिन पर कुछ क्षण ऐसे भी आये, जब चहुँ ओर की उल्लास और शोर शराबे के बीच मैं आत्म मनन में जुट गया - जीवन के बारे में सोचने लगा. (शायद बढती उम्र का असर होगा!!) . उन्ही विचारों को कविता का रूप देकर आपसे साँझाकर रहा हूँ. आशा है कि आप मेरी इस आत्म-चिंतन को परोसने की धृष्टता को अपना प्रेम देकर क्षमा करेंगे.
सादर,
सुधीर




अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित,
या जीवन-लालसा में व्यर्थ श्वांस-घट रिक्त ...

दो-राहों से पटे समर में, कब संशय-मुक्त
जो पथ पकड़ा क्या वही सहज उपयुक्त
न नाप सका जिन पगडंडियों की लचक
क्यों उनकी कमनीय कामनाओं से व्यथित?
अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित.... 

अधजल गागर का हैं यह थोथा स्वर,
या शुन्यता देती चुनौती मुझको प्रखर
मोक्ष मेरा क्या ज्ञान-सिन्धु आप्लावित
मुक्ति-मार्ग होगा श्रम-साध्य स्वेद लिप्त
अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित....

मखमली स्वप्निल संभावनाओं से सुसज्जित
इच्छाओं आकांक्षाओं की अट्टालिकाओं से सृजित
क्या होगा मेरा स्वर्णिम भावी-भविष्य परिलक्षित
या कपोल-कल्पित तृष्णामयी होगा जीवन व्यतीत
 अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित....

काल के कपाल पर रहूँगा एक अरुणिम तिलक,
यश कीर्ति की रश्मिया लेकर फहरेगा मेरा ध्वज
या कौन जाने? मरू में अंकित एक रेखा की तरह
क्षण भर में ही हो जाये मेरा अस्तित्व विलुप्त
अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित....

अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित,
या जीवन-लालसा में व्यर्थ श्वांस-घट रिक्त ...

Tuesday, December 1, 2009

मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!





बड़ी मुद्दत के बाद आज तन्हा हूँ,
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!
आंसू न पोछो, मुझे धीर न दो
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

अपनों  को परखने की,
मुझको न थी आदत ही कभी,
वो छलतें है मुझको, तो छल  लेने दो.
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

माँगा ही किया है दुनिया ने हरदम,
मुझसे कीमत हर रिश्ते नातों की
आज देती हैं वो धोखा तो दे लेने दो.
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

जिन्दा रहने की है शर्त अगर,
ताउम्र सांसों की सलीब उठाना,
तो पल-पल मर के भी जी लेने दो.
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

सजदे में ही रहा जीता मैं,
बचता बगावत के इल्जामों से,
अब कटता सर मेरा, तो कट लेने दो.
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

गैर-ज़रूरी  है अब दुनियादारी में
इन बेमतलब उसूलों का सबब.
कुछ बेचता हूँ मैं, तो बिक लेने दो
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

औरों  के बनाये  निज़ामों  पर,
जीना ही तो रही किस्मत मेरी,
(अपनी इक) ख्वाहिश पर मरता हूँ, तो मर लेने दो
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

बड़ी मुद्दत के बाद आज तन्हा हूँ,
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!
आंसू न पोछो, मुझे धीर न दो
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

Tuesday, November 24, 2009

हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!




हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

 जब एक कट-चाय समोसे से,
हम यह दुनिया नापा करते थे,
एक ख्याली धागे के दम पर,
हम  हर सिस्टम बांधा करते थे
यूँ तो हर बात फलसफे पर होती थी
एक हम ही ज्ञानी-विज्ञानी थे  बस्ती  के
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के  !!

हर जटिल विषय की कक्षाएँ
केवल  जीकेडी पर लगती थी
सत्तर प्रतिशत अटेनडेंस पाने को
सिर्फ प्रॉक्सी की कौडी चलती थी
यूँ तो (असाइनमेंट) टोपिंग में हम शातिर थे  पर
कुछ कर जाते थे श्रमदान जूनियर्स जबरजस्ती से
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

वैसे तो एक ख्वायिश की उलझन में
अक्सर कितनी राते जागा करते थे,
पर हर रात परीक्षा से पहले हम,
हर दिन पढने की कसमे खाया करते थे
यूँ तो एक साल में पढना मुश्किल था पर
कई पोथी घिस जाते थे एक रात में चुस्ती से
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

एक अदद पिक्चर की खातिर हम,
हॉस्टल में सबसे चिल्लर  माँगा करते थे
मुफलिसी के दौर  रहे तो सब मिलकर
कपूरथला गंजिंग की गलियां नापा करते थे
यूँ तो एक मैगी  से  दस-दस खाया  करते थे
उधार चुकाने को दिखला देते थे दांत बत्तीसी  के
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

हर अखबारी कतरन पर जमकर ,
हम सबके रिश्ते छाना करते थे,
सबकी प्रेम-कहानी पर हँसते हम पर
'उससे' मिलकर बगले झाँका करते थे
यूँ तो हर बात खनक से होती थी
पर क्या समझाते उसको कारण चुप्पी के
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

* ~ * ~ * ~ * ~ * ~ * ~ *
यह कविता अचानक फेसबुक पर एक लंगोटिया यार के मिल जाने पर मन से निकली आह से उत्पन्न हुई है. उससे बात करते करते कॉलेज के पुराने दिन याद आ गए. जब परीक्षा से एक रात पहले पाता चलता था कि एक पूरी कि पूरी किताब कोर्स में हैं जिसका हमे पाता ही नहीं था ...हर जटिल विषय की क्लास से हम ऐसे गायब रहते थे जैसे कि गधे के सर से सींग... सत्तर प्रतिशत उपस्थिति दर्ज हुई नहीं कि उस क्लास से हमारा डब्बा गोल, उसके बाद तो हम केवल ढाबों पर चाय की चुस्की का आनंद लेते मिलते थे. सांख्यिकी से ज्यादा मेंहनत पिया-मिलन वाले जोडों की गणना में करते थे. उस समय हम समाज और संसार के हर विषय पर बहस करने का माद्दा रखते थे और संसार की समस्त समस्याओं का समाधान तो हम बैठे बैठे चुटकियों में निकाल लेते थे. बस ढाबे की एक सांझी चाय और समोसे का भोग लगता रहे (चाहे उधारी पर ही क्यों न ) तो सामायिक विषयों से लेकर लोकल प्रेम प्रसंगों पर हमारी ज्ञान ग्रंथि खुली रहती थी. क्योंकि यह रचना दिल की अभिव्यक्ति है इसलिए मैंने कई परचित देशज (और विदेशज) शब्दों को भी नहीं बदला है. कुछ अप्रचिलित शब्दों की परिभाषा निम्न  है.

  •  जीकेडी: गुप्ता का ढाबा. लखनऊ आई.ई. टी (इन्जिनेरिंग कॉलेज) के साथ में चलने वाला ढाबा. हमारे छात्र-जीवन में सारे के सारे ढाबों का विलायतीकरण उनके नामों के संक्षिप्त करके ही किया गया था जैसे मिश्रा का ढाबा यमकेडी, गुप्ता का ढाबा जीकेडी. इस ढाबों ने जितने सपनों को बनते बिगड़ते देखा हैं शायद ही आस-पास को कोई ईलाका उसकी बराबरी कर पाए - चाहे वो नौकरी या छोकरी के सपने हो या पनपती छात्र-राजनीति की महत्वाकांक्षाएं.


  • टोपिंग: प्रोजेक्ट या असाइनमेंट की नक़ल (टोपने अथवा टीपने) की कला; जो अक्सर एक घिस्सू छात्र के समाधान निकालने के बाद अक्सर स्वयं या जूनियर्स द्वारा कक्षा के अन्य  उन्मुक्क्त विचारों वाले छात्रों के लिए प्रतिलिपि बनाने की कला के लिए प्रयुक्त होता है.

  • गंजिंग = लखनऊ के प्रगतिशील हजरतगंज के इलाके में जीवन के फलसफे और रंगीनियों को तलाशते हुए हम जैसे फक्कडों का घूमना

Tuesday, October 27, 2009

तेरी रुसवाई से, मेरी बेवफाई का इल्जाम अच्छा है




यह मेरे दर्द का फ़साना, कुछ झूठा कुछ सच्चा है
शब-ए-हिज्र की हैं बातें, तुम ही सुनते तो अच्छा है

कहकर तो देखो कभी, परियों की बातें उनसे
हर संजीदा दिल में, सहमता हुआ एक बच्चा है

इसी बहाने पहचान हो गई दोस्त दुश्मनों की,
भरी रईसी से, मेरा मुफलिसी हाल अच्छा है

गोया दिल लगाने का, उनको है तजुर्बा इतना,
पहली नज़र में दिल लेकर, कहते हैं कि अच्छा है

क्या बताते हम नाम सबको, अपने हसीं कातिल का
सुना है कि इस शहर में, हर शख्स कानो का कच्चा है

कुछ आरजू हमको भी थी, इस दिल को  मिटाने की
वरना तेरी महफ़िल से तो, अपना मयकदा अच्छा है

किससे कहता दास्ताँ, सबब तेरी बेपरवाह मुहब्बत का
तेरी रुसवाई से, मेरी बेवफाई का इल्जाम अच्छा है

Tuesday, October 20, 2009

दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ





दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ
पर कोई क्या बताए क्यों थी दिलों में दूरियाँ

दिल में रख छोड़ा था एक ख्याब सुनहरा सा
जिनमे हमेशा वो रहा जिसके ख्याबों में मैं ही कहाँ था?
और क्या कहें,  क्या रही हमारी मजबूरियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ

उम्र-भर बैठे रहे, जिसकी राहों में हम नज़रें बिछाए
मुझसे मिला वो, तो उसके पास मेरे लिए वक्त ही कहाँ था?
और क्या कहें, क्या रहीं ज़माने भर की मसरूफियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ

मंजिलों की तलाश में हम चले तो सब साथ-साथ थे,
जिसके साथ मैं चला, उसके हाथ में मेरा हाथ ही कहाँ था?
और क्या कहें, क्या रही मेरी बदनाम कहानियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ

हाल-ए-दिल कहने को लिखी जिसके नाम गज़लें तमाम,
उनको सुनने को वो, महफ़िल में तन्हा आया ही कहाँ था?
और क्या कहें, क्या रही उस शाम मेरी खामोशियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ

दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ
पर कोई क्या बताए क्यों थी दिलों में दूरियाँ


Tuesday, October 13, 2009

साँसों में लिपटी पड़ी है मिट्टी, लोग उठाते क्यों नहीं.




इश्क का है फ़साना, सबको खुल कर बताते क्यों नहीं.
दिल पे हैं ज़ख्म कई, ग़ज़ल कोई गुनगुनाते क्यों नहीं

वो कहते हैं कि इश्क में शर्म-औ'-हया हैं पिछले ज़माने की बातें,
हमने तो कह दिया है खुलकर, तुम अब नजरें मिलाते क्यों नहीं

बहुत मजाजी है मिजाज़-ए-यार हमारे दिलबर का,
ख़त लिखते हैं कि हम कब से रूठे हैं, मानते क्यों नहीं

दिल लगाकर दिल मिटाना हैं आदत हुस्नवालों की,
वो आकर मजबूरी-ए-हालात गिनाते क्यों नहीं

वक्त की हवाएं धुंधला देती हैं हर मंजर निगाहों में,
कितने तूफां गुजरे, तेरे ख्याबों को मिटाते क्यों नहीं.

इश्क में जलकर मर मिटना तो हर परवाने का हैं जुनूँ,
कत्ल हुए कितने, लोग शमाँ-ए-बज्म को बुझाते क्यों नहीं

बहुत रुस्वां हुआ हूँ तेरे इश्क की खातिर मैं,
तुम बीती बातों से कुछ पर्दा उठाते क्यों नहीं

देते ही रहते हैं तंज़ के मुबारक तोफहे मुझको,
नाकाम फसानों को ज़मानेवाले भुलाते क्यों नहीं 

गम-ए-हिज्र का मय औ' मीना से हैं रिश्ता पुराना ,
कशाने-इश्क पूछे है साकी पर पिलाते क्यों नहीं.

कब का मर गया है दास्ताँ उसके जाने के बाद,
साँसों में लिपटी पड़ी है मिट्टी, लोग उठाते क्यों नहीं.

Tuesday, September 29, 2009

...कोई तो मेरा किस्सा पुराना मिले


वो पलटते हैं मेरी डायरी के सफे कि कोई तो मेरा किस्सा पुराना मिले,
हर नज़्म नाम उनके औ' वो कहते हैं कोई तो मेरे यार का इशारा मिले

कुछ उनकी नाजों-अदा और कुछ मेरी यह चुप रहने की आदत
कभी तो समझे वो इन ज़ज्बातों को तो सबको एक फ़साना मिले

अनुभव की चांदी जब जुल्फों पर छाने लगे औ' आइना चेहरा झुठलाने लगे
मेरी आँखों में झाँककर सँवारना ख़ुद को , तब भी तुझको वो चेहरा सुहाना मिले

हुस्न की हो मूरत अभी तुम, कई सर तेरे दर पर सजदे में झुक जायेंगे
ढलती उम्र में देखना उस चौखट को, शायद हम सा ही कोई दीवाना मिले

ख़बर हैं कि फ़िर कत्ल हुआ है उनके शहर में आशिक़ कोई ,
देखना कोई जाकर दोस्तों कहीं वो ही खंजर न पुराना मिले

मैं मर भी रहा हूँ यूँ करके कि मेरी मइयत में तो आयेंगे
कुछ तो 'दास्ताँ' उनसे खुलकर मिलने का बहाना मिले

Tuesday, September 22, 2009

क्या विराम दूँ अभिव्यक्ति को?




क्यों मन में एक शून्य हैं पनपा,
क्या विराम दूँ अभिव्यक्ति को?

 पाषाण हूँ, मैं कोई बुद्ध,
पक्ष में, मैं किसीके विरूद्व
क्यों फ़िर हृदय-संवेदना च्युत,
सिर्फ़ शून्य! प्रवाह सभी अवरुद्ध।।
मुझे कामना की प्यास ,
मुझे निर्वाण की कोई आस।
विदेह ह्रदय हर भावना से मुक्त,
क्यों फ़िर ह्रदय न  गीत साधना से युक्त?


नहीं पसीजता लेस भर हृदय
किसी भी करुण क्रौंच-क्रंदन पर,
नहीं दहकता सूत भर ह्रदय
आज स्वयं के भी मान-मर्दन पर
दिग्भ्रमित पथिक अथक ढूंढता हो
मंजिले ज्यूँ मध्य के पड़ाव पर
शब्द वसन लपेटे खडा हूँ, नग्न बाज़ार में,
क्यों फिर न टपकता काव्य-अश्रु  अभाव  पर?


बौधिक हो रही है काव्य-रचना,
दर्द नहीं इसमे संसार का,
रंगा-पुता हैं हर शब्द पर,
अंश नहीं हैं इसमें प्यार का,
सजे हुए हर्फ बेतरकीब कई  ,
कोई सलीका नहीं इनमे इज़हार  का
साज-सज्जित और अलंकृत हैं छंद
क्यों फिर भाव नहीं हैं कतिपय अहसास का ?


क्यों मन में एक शून्य हैं पनपा,
क्या विराम दूँ अभिव्यक्ति को?


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