इश्क का है फ़साना, सबको खुल कर बताते क्यों नहीं.
दिल पे हैं ज़ख्म कई, ग़ज़ल कोई गुनगुनाते क्यों नहीं
वो कहते हैं कि इश्क में शर्म-औ'-हया हैं पिछले ज़माने की बातें,
हमने तो कह दिया है खुलकर, तुम अब नजरें मिलाते क्यों नहीं
बहुत मजाजी है मिजाज़-ए-यार हमारे दिलबर का,
ख़त लिखते हैं कि हम कब से रूठे हैं, मानते क्यों नहीं
दिल लगाकर दिल मिटाना हैं आदत हुस्नवालों की,
वो आकर मजबूरी-ए-हालात गिनाते क्यों नहीं
वक्त की हवाएं धुंधला देती हैं हर मंजर निगाहों में,
कितने तूफां गुजरे, तेरे ख्याबों को मिटाते क्यों नहीं.
इश्क में जलकर मर मिटना तो हर परवाने का हैं जुनूँ,
कत्ल हुए कितने, लोग शमाँ-ए-बज्म को बुझाते क्यों नहीं
बहुत रुस्वां हुआ हूँ तेरे इश्क की खातिर मैं,
तुम बीती बातों से कुछ पर्दा उठाते क्यों नहीं
देते ही रहते हैं तंज़ के मुबारक तोफहे मुझको,
नाकाम फसानों को ज़मानेवाले भुलाते क्यों नहीं
गम-ए-हिज्र का मय औ' मीना से हैं रिश्ता पुराना ,
कशाने-इश्क पूछे है साकी पर पिलाते क्यों नहीं.
कब का मर गया है दास्ताँ उसके जाने के बाद,
साँसों में लिपटी पड़ी है मिट्टी, लोग उठाते क्यों नहीं.