प्यारे पथिक

जीवन ने वक्त के साहिल पर कुछ निशान छोडे हैं, यह एक प्रयास हैं उन्हें संजोने का। मुमकिन हैं लम्हे दो लम्हे में सब कुछ धूमिल हो जाए...सागर रुपी काल की लहरे हर हस्ती को मिटा दे। उम्मीद हैं कि तब भी नज़र आयेंगे ये संजोये हुए - जीवन के पदचिन्ह
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Tuesday, November 16, 2010

ज़िन्दगी दो अल्फाजों में सिमट आती है


ज़िन्दगी दो अल्फाजों में सिमट आती है
आह तेरे नाम से  जब भी निकल आती है

दौर-ए-उल्फत में बहके होंगे कदम हमारे
अब तो तेरी हर बात संजीदा नज़र आती है

कैसे रखते हैं लोग दिल में हसरतें हज़ार
इक आरज़ू में तेरी ये उम्र गुजर  आती हैं

न दिखा ज़ख़्म औ' जज़्बात ज़माने-भर को
हों करम उसके तो ये रहमत नसीब आती है

हैं यकीन दास्ताँ ठुकराएगा वो दिल तेरा
देंखे उनके जानिब ये कब खबर आती है

Tuesday, November 2, 2010

ज़माना है



मेरे हालात पर क्यों हँसता ज़माना है
मेरा कातिल मेरा मुनसिब ज़माना हैं

हर गम-औ-ख़ुशी को बेबस अपनाना है
हाय! क्या बेदर्द यह दस्तूर-ए-ज़माना है

तन्हा सबको अपनी सलीबें खुद ही ढोना है
यूँ तो कहने को सबका हमदर्द ज़माना है

करके तौबा तेरे सजदे में सिर झुकाना है
इश्क-ए-इबादत को जुर्म कहता ज़माना हैं

तेरे मेरे नाम पर निकला इक फ़साना है
न छिपा अब जख्म, कुरेदेगा ज़माना है

तन्हाईयों में भी 'दास्ताँ' सलीके से रोना हैं
दिलजलों की आह को भी परखता ज़माना हैं

Tuesday, October 19, 2010

कुछ तो असर आहों में है

मित्रों, 
एक लम्बे  अंतराल के बाद आप सब से मुखातिब हूँ. इस बीच कुछ समय के लिए जननी और जन्मभूमि की चरण-रज लेने हेतु भारतवर्ष गया. अपने इस यात्रा में हमने अजंता-एल्लोरा और देवगिरी दुर्ग (दौलताबाद) की भव्य विथिकायों में भी रमण करने का अवसर प्राप्त हुआ. उनकी भव्यता और कलात्मकता  देखकर  ह्रदय  कई  दिनों  तक पाषाणों पर लिखे  उन रागों के अनुराग से विरक्त नहीं हो पाया और न जाने कितनी रचनाएँ पाषाणों से लेकर पत्थर, जीवन से लेकर निर्जन पर लिख डाली.  वापस आने के बाद भी कुछ समय गृहस्थी और दाल-रोटी के चक्कर में आप से वार्ता नहीं हो पाई. लेकिन अब हाजिर हूँ . आशा हैं आपका स्नेह सैदव की भांति मुझे मिलता रहेगा.
 सादर,
सुधीर



थी मेरी मंजिल वो पर अब किसी और की राहों में है
सुना है मेरी मुन्तजिर वो कुछ तो असर आहों में है

न मिटी खलिश कि मिट जाये दूरियाँ दिल की उनसे 
बिताई हमने सिमटकर उम्र जिनकी बेवफा बाँहों में है  

सुना न  ये किताबी बाते कुफ्र औ' क़यामत की वाइज
गुजारी कोई रात क्या तुने उन जुल्फों की पनाहों में है

गोया होगा कोई और भी चेहरा दिलकश चाँद-सितारों सा
हमे तो आरजू इतनी कि मिले वो चेहरा जो निगाहों में है

खो गए 'दास्ताँ' ज़माने कितने खोकर इश्क-ए-मंजिल
हुआ है शायर तू, ये कशिश इन कुरेदे हुए घावों में है

Tuesday, July 20, 2010

दिल-तोड़ने से पहले थोडा इंतज़ार कीजिये


यूँ बैठे बैठे न आप, आहें हजार लीजिये
इश्क है गर आपको तो  इज़हार कीजिये

करवटों में गुजरेंगे, जागती रातें कितनी
ख्याबों में आकार ही हमे बेक़रार कीजिये

दबाने से नहीं हासिल, इश्क को मंजिल
किसी रोज़ तो दिल का कारोबार कीजिये

मुहब्बत में कहाँ होती, गुंजाइश शिकवों की
हाज़िर है जिगर अपना खुलकर वार कीजिये

जवानी में बहकना भी, होती है इक अदा
किन्ही मामलों में दिल का एतबार कीजिये  

मुन्तजिर रहा है 'दास्ताँ',  उम्र भर आपका
दिल-तोड़ने से पहले थोडा इंतज़ार कीजिये

Tuesday, July 6, 2010

तेरी यादों की है रहमत, हम अकेले न होंगे


होगा यूँ भी ज़िन्दगी में कि ये मेले न होंगे
तेरी यादों की है रहमत, हम अकेले न होंगे

मिलेगा वो मुकाम कभी तो इश्क वालों को
ज़माने के हाथों में सिर तलाशते ढ़ेले न होंगे

दिल टूटने का दिलकश फ़साना अपना इश्क
चलेगा तब भी जब फुसफुसाते घरोंदे न होंगे

हो जवाँ मिल ही जायेंगे आशिक़ कई तुमको
करे इंतजार ताउम्र, ऐसे हमसे अलबेले न होंगे

करोगे तलाश कभी तो बुझते हुए चिरागों की
लौटते  दर पे हर मौसम फरेबी-सवेरे न होंगे

होगी महसूस तुम्हे भी ज़िन्दगी-भर की खलाएं,
होगी ग़ज़ल तेरे नाम, पर अहसास मेरे न होंगे

निभाता रह दास्ताँ तू रस्म-ए-मुहब्बत उम्रभर
होगी क़द्र जज्बातों की जब निशाँ तेरे न होंगे

Tuesday, June 1, 2010

उसका आया है ख़त कि भूल जाऊं उसे


आया है ख़त उसका कि अब भूल जाऊं उसे
ग़ज़ल न रही वो मेरी, अब न गुनगुनाऊ उसे

रहा यतीम ख्याल सुनहरा तेरे मेरे रिश्ते का
जब न कोई निस्बत तुझसे तो क्या अपनाऊँ उसे

उफ़क तक भी न पहुंचा अहसास अक़ीदत का
खौफज़दा सजदों का सच, मैं क्या बतलाऊँ उसे

बढ़ गया बहुत आगे वो लेकर नाम तिजारत का
दिल औ' जज्बातों की बात अब क्या समझाऊँ उसे

सच कहता है वो बनकर रहनुमा हम गरीबों का
हालात-ए-मुफलिसी बयाँ करके  क्यों झूठलाऊँ उसे

नाम न दे सके जिस अहसास को दुनियादारी का  
क्यों ज़रूरी हैं कि मैं किसी नाम से बुलाऊँ उसे 

हद-ए-आईने में कैद हैं एक शख्स दास्ताँ तुझ सा
छोड़े खामोशियों की चिलमन,  तो पहचान पाऊँ उसे

Tuesday, April 27, 2010

दर्द-ए-दिल दिल तक ही रखूँ, यह ज़रूरी तो नहीं


दर्द-ए-दिल दिल तक ही रखूँ, यह ज़रूरी तो नहीं,
सरेआम रों दूँ, पर ऐसी भी मेरी मजबूरी  तो नहीं

ज़माने का दस्तूर निभाना, है हिदायत वाइज़  की
फिर मिलेगी जन्नत पर यह उम्मीद पूरी तो नहीं

डरता हूँ बेअदबी की तोहमत न दे मुझको  ज़माना
बस सच कहता हूँ, फितरत मेरी जी-हुजूरी  तो नहीं 

दर्द हद से गुजर गया होगा जर्ब चाक-जिगर का
आवाज भर्राई है पर ऑंखें उसकी सिंदूरी तो नहीं

खो गया कहीं रिश्ता हमारा वक्त की सियासत में
फिर भी पास है तू, एक हिचकी कोई दूरी तो नहीं

वो जाते जाते जिंदगी मेरी ख़लाओं से भर गया
शिकवा क्या करे दास्ताँ, जिंदगी अधूरी तो नहीं

Tuesday, March 23, 2010

आशिक़ की थी आखिरी-आह....



आशिक़ की थी आखिरी-आह, नतीजा ज़माना-ए-बेइंसाफ की
सबको दे गया था वह दुआएं  बस शिकायत अपने खिलाफ की

 हुआ क़त्ल चुपचाप पर  कह न सका बेवफाई यार की
रहा सोचता शब-ए-क़यामत को होगी बात इंसाफ की

खलती नहीं  नाराजगी उनकी जो झूठे शिकवों से इजहार की
मालूम हैं हमको चलती नहीं देर तक ठंडक लिहाफ की

थी खबर  उसको भी मेरी ताउम्र कशमकश औ' इन्तजार की
चुपचाप नज़रें फेरकर उसने, न जाने कितनी  बातें साफ की

क्या मासूम है अदा दास्ताँ उनकी जुल्मत के इकरार की
पूछते हैं हमसे दिल तोड़ने की सजा भी क्या मुआफ की

Tuesday, March 16, 2010

गम है कि जिन्दा हूँ, वरना खुशियों से तो मर जाता



गम है कि जिन्दा हूँ, वरना खुशियों से तो मर जाता
तनहाइयों ने थामे रखा, वरना जमाने में किधर जाता

सौ बार हुआ क़त्ल रहा फिर भी धड़कता मेरा दिल
माजी की थी चाहत नहीं तो इक झोके से बिखर जाता

न छिपा ज़ालिम पर्दों में यूँ, इस गुल-ए-हुस्न को अपने
होती हैं आफ़ताब आशिक़-निगाहें, पड़ती तो निखर जाता  

खुशनसीब हूँ मैं कि उसने  मुझसे इक रिश्ता तो बनाया
ज़फ़ा करके वो कायम है, वफ़ा करता तो मुकर जाता

दिल टूटा है होगा तूफां से तेरा सामना उम्रभर अब तो
ख्याब कोई टूटा होता तो मौसमी गुबार सा गुजर जाता

रहमत उसकी जो हँसकर दिल लगाया भी, मिटाया भी
मेरे दामन को वरना कोई कैसे इन गजलों से भर जाता

हुई हैं कामयाब दास्ताँ कुछ तो रकीबों की बाते वरना
तुझसे मिलकर वो मुस्कुराता सा चेहरा न उतर जाता

Tuesday, February 23, 2010

क्या कहता वो, बस रो पड़ा मेरा नाम लेकर



पूछा जो हाल-ए-दिल, साकी ने  दो जाम देकर
क्या कहता वो, बस रो पड़ा मेरा नाम लेकर

गम-ए-हिजरा में होती हैं ऐसी भी हैं अदाएं,
बतियाते हैं वो, आईने से मेरा नाम लेकर

हालात का मारा है शायद, होगा खौफज़दा भी,
सुनाता है वो, फ़साना अपना मेरा नाम लेकर

गर्दिश में बदलती हैं, तहजीबो-अदब की निगाहे,
बुलाते हैं वो, न अब मुझको मेरा नाम लेकर

हमशक्ल न सही, हममिजाज़ तो होगा वो शख्स
भुलाते हैं वो, जिसे दास्ताँ मेरा नाम लेकर

Tuesday, February 16, 2010

कैसे सरेआम कर दूं तेरे कांधे के बोसे को




हैं कई इल्जाम मुझ पर यूँ तो चुप रहने को
कैसे सरेआम कर दूं तेरे कांधे के बोसे को

कुछ तो बरकत मिली होगी  भूखे पेट सोने से 
वैसे तो मोमिन कहता है, कई रोज़ हैं रोजे को

चाक-जिगर है पर, दुनियादारी भी तो ज़रूरी
रोऊंगा मैं, खाली ही रखना एक तन्हा गोशे को  

मुफलिसी में करता हूँ हक-ए-मजलूम की बातें
कौन सिखाये दस्तूर-ए-ज़माना मुझ सरफरोशे को

हुस्न वालों पर एतबार से 'दास्ताँ' डरना कैसा
अपने क्या कम हैं, तोड़ते तेरे दिल-भरोसे को

Tuesday, February 9, 2010

यह जवानी है मेरे दोस्त, इसे परदे क्या छिपाएं



नाकिस सा गुस्सा उसका, बड़ी भोली सी अदाएँ
यह जवानी है मेरे दोस्त, इसे परदे क्या छिपाएं

शिकवा उन्हें कि हिचकी नहीं आती, याद नहीं करते
कभी भूले ही नहीं जिसे, उसे कोई कैसे याद दिलाएं

कासिद के साथ ही आई थी कुछ भीगी सी फिजाएँ
खाली ख़त में  सब बयां कर गई तेरी अश्क  धाराएँ

होंगे आशिक़ कई जो सहते जुल्म-ओ-सितम तुम्हारे
पर होगा हम सा न कोई, जो हर जख्म पर दे दुआएँ

तेरे दो बूँद आसुओं के सैलाब से मर जाता 'दास्ताँ'
फिर क्यों हर शक्स तेरे शहर का है पत्थर उठाये 

Tuesday, January 12, 2010

बचना वो हँसकर मिलता है दोनों बाहें फैलाएं




बचना वो हँसकर मिलता है दोनों बाहें फैलाएं
मुश्किल में होगा न जाने कौन सा काम बताए

चुनावी मौसम था, वादों की बयार में गुजर गया
आओ अब खुद सुलझाएं अपनी अपनी समस्याएँ 

रही बाट जोहती शिक्षक की किनती सारी कक्षाएँ
ट्युशन से पार लगेंगी इस साल की भी परीक्षाएं

सच ही होगी खबर दंगों की आज के अखबार में
सरकार ने कहा सब विपक्ष ने हैं फैलाई अफवाहें

दाल-रोटी महंगी हुई पर जीने की और विवशताएँ
घी-लकड़ी के दाम हैं दुने बड़ी महंगी पड़ेगी चिताएँ

न कर उम्मीद दास्ताँ किसी भी पीर औ' मुर्शिद की
बदलनी किस्मत हैं तुझको तो खुद गढ़ अपनी राहें

Tuesday, January 5, 2010

कतरा कतरा मैं बह जाऊंगा



मकाँ इक पुराना हूँ मैं, तेरी गर्म सांसों से ढह जाऊंगा
न रो मेरे काँधों से लगकर, कतरा कतरा मैं बह जाऊंगा

आशिक़ बनकर जिया हूँ मैं, आशिक़ बनकर मर जाऊँगा,
छिपाया ताउम्र नाम जो आखिरी हिचकीं में कह जाऊंगा

रात-रात जागा हूँ मैं, चुभते हुए ख्याबों की मानिंद
सुबह एक प्यास  की तरह,  तेरी आँखों में रह जाऊंगा

आता ही नहीं हूँ मैं, तेरी दर पर दिल लगाने के डर से,
तेरे आंसूओं का इल्म मुझे, अपना दर्द तो सह जाऊंगा

इक फकीरी ख्याल हूँ मैं  'दास्ताँ' अजनबी नहीं कोई,
तेरे शहर में किसी भी  गुमनाम गली में लह जाऊँगा

Tuesday, December 22, 2009

रात भर....



जागा रात भर, सोया  न बिस्तर बेगाना मेरा,
हर करवट सदाएँ देता था सपना पुराना  तेरा.

सोचा रात भर, वजहें तेरी बज़्म में आने की,
काश मुझको मालूम न होता ठिकाना  तेरा

चर्चा रात भर, चलता रहा महफ़िल में मेरा,
जब बात ही बात में निकला फ़साना तेरा

रोया रात भर, आमावस को चकोर कोई,
दूर से देखा होगा उसने चेहरा सुहाना तेरा

घूमा रात भर, गली-कुंचा बदहवाश बेचारा
पागल सा दिखता था, होगा दीवाना तेरा

भीगा रात भर, अपने खूँ के दरिया में दास्ताँ
रंजिशे थी शहर की हमसे औ' बहाना तेरा

Tuesday, December 8, 2009

हुआ इश्क में रुस्वां, इक नई पहचान ढूंढता हूँ



मुसाफिर हूँ यारों, इक शहर अनजान ढूंढता हूँ
हुआ इश्क में रुस्वां,  इक नई पहचान ढूंढता हूँ

मजहब के वादों पर मरते  रोज़ इंसान देखता  हूँ
बता दे जो खुदा को मेरा दर्द,  वो अजान ढूंढता हूँ

दहशत में जीता है, बनकर तमाशाई मेरा  शहर
फूँक दे जो मुर्दा दिलों में जान, वो इंसान ढूंढता हूँ

सरहदों के नाम पर, बाँट ली है यह ज़मी सबने,
पनाह दे जो हर किसी को, वो आसमान ढूंढता हूँ

तंग-हाल जीकर भी, क्या पाया  है सुकून किसी ने
बेच के उसूल, इस दौर में रास्ता आसान  ढूंढता हूँ

दुश्वार है बेखौफ, कुछ सुनना-सुनाना इस जहाँ में
जहाँ हो गुफ्तुगू खुद से, वो इलाका वीरान ढूंढता हूँ

असर कुछ तो हैं उसकी जफा का  'दास्ताँ' तुझपर,
देख के वो नज़रें फिराता है औ' मैं अहसान  ढूंढता हूँ

Tuesday, November 10, 2009

सुना है उनकी तस्वीर ईनाम पाने को है



रोते बच्चे जो, मोहताज़ दाने-दाने को है
सुना है उनकी तस्वीर ईनाम पाने को है

फिर मुस्कुराती है, हर इक बात पर वो,
आँखों में उसकी सावन छाने को है.

सहमने लगा हैं यह शहर शाम ही से,
लगता है कोई त्योहार आने को है

बदलने लगे हैं, बात बात-ही-बात में वो,
दिल-ए-नादाँ तू धोखा खाने को है

तुझसे ही हैं, बावस्ता सारे गम मेरे यूँ तो
ज़माने की खुशियाँ वर्ना लुटाने को है

मिलने लगे हैं हंसकर सब दोस्त मुझसे,
खंजर कोई दिल आजमाने को है

मौत की राह है, देखता 'दास्ताँ' तू क्यूं
बहाने कम क्या जान जाने को हैं

Tuesday, October 27, 2009

तेरी रुसवाई से, मेरी बेवफाई का इल्जाम अच्छा है




यह मेरे दर्द का फ़साना, कुछ झूठा कुछ सच्चा है
शब-ए-हिज्र की हैं बातें, तुम ही सुनते तो अच्छा है

कहकर तो देखो कभी, परियों की बातें उनसे
हर संजीदा दिल में, सहमता हुआ एक बच्चा है

इसी बहाने पहचान हो गई दोस्त दुश्मनों की,
भरी रईसी से, मेरा मुफलिसी हाल अच्छा है

गोया दिल लगाने का, उनको है तजुर्बा इतना,
पहली नज़र में दिल लेकर, कहते हैं कि अच्छा है

क्या बताते हम नाम सबको, अपने हसीं कातिल का
सुना है कि इस शहर में, हर शख्स कानो का कच्चा है

कुछ आरजू हमको भी थी, इस दिल को  मिटाने की
वरना तेरी महफ़िल से तो, अपना मयकदा अच्छा है

किससे कहता दास्ताँ, सबब तेरी बेपरवाह मुहब्बत का
तेरी रुसवाई से, मेरी बेवफाई का इल्जाम अच्छा है

Tuesday, October 13, 2009

साँसों में लिपटी पड़ी है मिट्टी, लोग उठाते क्यों नहीं.




इश्क का है फ़साना, सबको खुल कर बताते क्यों नहीं.
दिल पे हैं ज़ख्म कई, ग़ज़ल कोई गुनगुनाते क्यों नहीं

वो कहते हैं कि इश्क में शर्म-औ'-हया हैं पिछले ज़माने की बातें,
हमने तो कह दिया है खुलकर, तुम अब नजरें मिलाते क्यों नहीं

बहुत मजाजी है मिजाज़-ए-यार हमारे दिलबर का,
ख़त लिखते हैं कि हम कब से रूठे हैं, मानते क्यों नहीं

दिल लगाकर दिल मिटाना हैं आदत हुस्नवालों की,
वो आकर मजबूरी-ए-हालात गिनाते क्यों नहीं

वक्त की हवाएं धुंधला देती हैं हर मंजर निगाहों में,
कितने तूफां गुजरे, तेरे ख्याबों को मिटाते क्यों नहीं.

इश्क में जलकर मर मिटना तो हर परवाने का हैं जुनूँ,
कत्ल हुए कितने, लोग शमाँ-ए-बज्म को बुझाते क्यों नहीं

बहुत रुस्वां हुआ हूँ तेरे इश्क की खातिर मैं,
तुम बीती बातों से कुछ पर्दा उठाते क्यों नहीं

देते ही रहते हैं तंज़ के मुबारक तोफहे मुझको,
नाकाम फसानों को ज़मानेवाले भुलाते क्यों नहीं 

गम-ए-हिज्र का मय औ' मीना से हैं रिश्ता पुराना ,
कशाने-इश्क पूछे है साकी पर पिलाते क्यों नहीं.

कब का मर गया है दास्ताँ उसके जाने के बाद,
साँसों में लिपटी पड़ी है मिट्टी, लोग उठाते क्यों नहीं.

Tuesday, September 29, 2009

...कोई तो मेरा किस्सा पुराना मिले


वो पलटते हैं मेरी डायरी के सफे कि कोई तो मेरा किस्सा पुराना मिले,
हर नज़्म नाम उनके औ' वो कहते हैं कोई तो मेरे यार का इशारा मिले

कुछ उनकी नाजों-अदा और कुछ मेरी यह चुप रहने की आदत
कभी तो समझे वो इन ज़ज्बातों को तो सबको एक फ़साना मिले

अनुभव की चांदी जब जुल्फों पर छाने लगे औ' आइना चेहरा झुठलाने लगे
मेरी आँखों में झाँककर सँवारना ख़ुद को , तब भी तुझको वो चेहरा सुहाना मिले

हुस्न की हो मूरत अभी तुम, कई सर तेरे दर पर सजदे में झुक जायेंगे
ढलती उम्र में देखना उस चौखट को, शायद हम सा ही कोई दीवाना मिले

ख़बर हैं कि फ़िर कत्ल हुआ है उनके शहर में आशिक़ कोई ,
देखना कोई जाकर दोस्तों कहीं वो ही खंजर न पुराना मिले

मैं मर भी रहा हूँ यूँ करके कि मेरी मइयत में तो आयेंगे
कुछ तो 'दास्ताँ' उनसे खुलकर मिलने का बहाना मिले
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