आज अपने विवाह की १०वी वर्षगांठ पर अपनी प्राण-प्रिया के लिए चंद पंक्तियाँ लिख रहा हूँ...मेरी हिंदी की डाक्टर साहिबा पत्नी को हो सकता है यें कविता काव्य-शास्त्रों के मापदंडों पर खरी न उतरती हुई प्रतीत हो... पर मैं इस सार्वजानिक मंच से बस इतना ही कहना चाहिंगा - यदि भावों की अभिव्यक्ति कविता है, यदि ह्रदय की टीस कविता हैं, यदि अव्यक्त अभिलाषाओं की बातें कविता हैं, तो प्रिय, फिर ये मेरे ह्रदय-उदगार भी कविता हैं....
प्यारे पथिक
Saturday, July 10, 2010
तुम
आज अपने विवाह की १०वी वर्षगांठ पर अपनी प्राण-प्रिया के लिए चंद पंक्तियाँ लिख रहा हूँ...मेरी हिंदी की डाक्टर साहिबा पत्नी को हो सकता है यें कविता काव्य-शास्त्रों के मापदंडों पर खरी न उतरती हुई प्रतीत हो... पर मैं इस सार्वजानिक मंच से बस इतना ही कहना चाहिंगा - यदि भावों की अभिव्यक्ति कविता है, यदि ह्रदय की टीस कविता हैं, यदि अव्यक्त अभिलाषाओं की बातें कविता हैं, तो प्रिय, फिर ये मेरे ह्रदय-उदगार भी कविता हैं....
Tuesday, September 29, 2009
...कोई तो मेरा किस्सा पुराना मिले
हर नज़्म नाम उनके औ' वो कहते हैं कोई तो मेरे यार का इशारा मिले
कभी तो समझे वो इन ज़ज्बातों को तो सबको एक फ़साना मिले
मेरी आँखों में झाँककर सँवारना ख़ुद को , तब भी तुझको वो चेहरा सुहाना मिले
ढलती उम्र में देखना उस चौखट को, शायद हम सा ही कोई दीवाना मिले
देखना कोई जाकर दोस्तों कहीं वो ही खंजर न पुराना मिले
कुछ तो 'दास्ताँ' उनसे खुलकर मिलने का बहाना मिले
Tuesday, September 15, 2009
क्या गिला करें हम अपने मासूम यार का...
क्या गिला करें हम अपने मासूम यार का।
किस किस से छिपायें नाम नादाँ यार का।
जिनके लिए बदनाम हुए, वो किस्से हमारे आम करे जाते हैं
कोई तो सिखाओ यारों उन्हें सलीका इश्क के इज़हार का ।
जिस पर भरोसा किया, उन्होंने ही तमाशा बनाया प्यार का
उम्र हुई न जाने कब आयेगा अब ये मौसम ऐतबार का ।
बहुत बेंचे हैं ख्याब उन्होंने, पल भर के खुलूस की खातिर
कौन जाने वो कब बंद करेंगे धंधा दिलों के कारोबार का ।
निगाहे यार नश्तर है और हुस्न औ'अदा खंजर उनके ,
हँसकर सहते हैं जुल्म, क्या शिकवा करें उनके वार का ।
लगकर मेरे सीने से कहते हैं वो उन्हें इश्क नहीं मुझसे ,
या खुदा क्या जालिम हैं ये अंदाज़ उनके इकरार का ।
रकीबों के इस शहर में सबकी हैं हर किसी से अदावत
कौन सुनेगा 'दास्ताँ' तेरा ये किस्सा पुराना प्यार का ।
Tuesday, September 8, 2009
तुझे मुझसे प्यार न करना हैं, तो न कर
फ़िर नज़रें भी न मिला, यूँ बेकरार भी न कर।
न देख इन मस्त निगाहों से मुझे ,
न हिला, रह रह कर गेसुओं की चिलमन।
दिलफेक नहीं पर आशिक मिजाज है दिल ,
रह-रह कर जुल्फ-ऐ-यार से उलझता है मन।
न छोड़, ठण्डी ठण्डी आहें छिप-छिपकर,
न मुस्कुरा, रह रहकर इन मासूम अदाओं से।
बेपरवाह नहीं, पर कुछ मदहोश है दिल,
रह रहकर बहकता है, हुस्न-ऐ-यार की सदाओं पे।
न थरथरा, रह रहकर होठों से इन हर्फ़ बेमायनों को।
प्यासा नहीं पर, कबका मुन्तज़िर है दिल
रह रहकर मचलता है लब-ऐ-यार के पैमानों को।
फ़िर नज़रें भी न मिला, यूँ बेकरार भी न कर।
Tuesday, August 11, 2009
तेरे बिना एक और दिन, एक और लम्हा
यादों के सिवा कुछ और नहीं, बस तन्हा-तन्हा।
यादों के दो हर्फ़ लिए, आयत सा मैं पढता जाता,
तेरे ही नाम के नुक्ते में,जीवन का हर अर्श मैं पाता
हर पल महसूस किया हैं तुझको अपनी हर बीती धड़कन में,
तेरी यादों के आँचल में ढांपा हैं ख़ुद को जीवन की हर सिहरन में,
तू मुझसे कुछ दूर सही, पर एक रिश्ता तो अब भी मुझसे बांधे हैं तुझको
रोते हम भी सबसे छुप-छुपकर पर तेरी यादों का जज्बा थामे हैं मुझको,
और कहूं क्या तुझसे मैं, अपने टूटे तन्हा दिल का हाल प्रिय,
इन यादों में तुम हो सो जन्नत हैं बाकी सब तो दोज़ख हाल प्रिय,
तेरे जाने का कोई गम मुझको नही -तेरी यादें जो अब आती हैं,
यह तो बस फ़िर मिलने की चाहत हैं जो अब तक तडपाती हैं।
मेरे होने न होने का इतना ही सबब होगा शायद मेरे हमदम !
तू मेरी यादों में हैं अब, मैं तेरी यादों में होऊंगा तब हरदम !
Tuesday, August 4, 2009
मेरे टूटे रिश्ते का हिस्सा होगा शायद!!
आँखों के करीने में कुछ तो चुभता हैं
मेरे टूटे रिश्ते का हिस्सा होगा शायद!!
एक उम्र हुई, जब वक्त के धुंधले में,
अनजाने में दुनियादारी की ठोकर से,
तेरे मेरे ख्याबों पर पाँव पड़ा था मेरा।
मेरे मजबूर हाथों से फिसला था
एक संग चलता संग-सा रिश्ता
पर बिखरा बेआवाज़ वो कांच-सा रिश्ता !!
और मैं बेखबर न तब समझ पाया था -
कि बंद मुठ्ठियों से मैं क्या खो आया था.
कितनी बार मैंने रिश्तों के बही-खाते,
ज़ज्बातों और समझोतों में बाँटे-छांटे।
पर वो बिखरा रिश्ता कहीं न सिमट पाया,
हर बार एक तेरा ही रिश्ता घट आया ।
अब वो हाथों से छूटा बिखरा-बिखरा रिश्ता
अक्सर इन तन्हा आँखों में मिल जाता हैं -
हुई मुद्दत पर अब भी चुभ जाता हैं -
आज भी ऐसा ही कोई किस्सा होगा शायद
आँखों के करीने में कुछ तो चुभता हैं
मेरे टूटे रिश्ते का हिस्सा होगा शायद!!
Tuesday, July 28, 2009
तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता
मैंने तो सुना था कि दर्द है बड़ा खुदगर्ज होता,
हर कोई सिर्फ़ अपनी ही किसी बात पर है रोता।
तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता,
वरना मेरे हालत पर, ऐ दोस्त! तेरा चेहरा न भीगा होता ।
तेरी झील सी गहरी आँखों में बसा समुंदर न होता,
यूँ बिना किसी आवाज़, बेबात यह निर्झर न बहता,
तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता,
वरना मेरे जज्बातों पर, ऐ दोस्त! तेरा दिल न पशेमाँ होता ।
पहचाने चेहरों की भीड़ में कोई अपना पाने का सलीका होता,
तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता,
वरना मेरे गम पर, ऐ दोस्त! तेरा न सिसकना होता।
हर किसी की कहनेवाले को न है कोई सुननेवाला होता,
हंसकर मिलनेवालों का है अक्सर भीगा तकिया होता,
तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता,
वरना सबके के लिए मरने वाला, ऐ दोस्त! न तेरा मेरा मसीहा होता।
Tuesday, June 16, 2009
गुमनाम ही रहने दो, ज़िन्दगी के सफे
गुमनाम ही रहने दो, ज़िन्दगी के सफे।
कहीं फ़साने तारीख न बन जाएँ
माना मुझे आग से खेलने की आदत,
डर है कि कहीं दामन उसका न जल जाएँ
ज़ार-ज़ार हैं जिगर कुछ इस कदर अपना,
छूने से ही कहीं ज़र्रा-ज़र्रा न बिखर जाएँ
माना मुझे तुफानो को आजमाने की आदत,
डर है कि झोंका कोई उसतक न पहुँच जाएँ
गुमनाम ही ....
तंज़ के नश्तर भी मुबारक हैं मुझको,
ज़ख्म दर ज़ख्म हैं पाला मैंने उनको
माना मुझे नासूर रखने की ही आदत,
डर है कि शिस्त कहीं उसको न चुभ जाएँ
गुमनाम ही ...
क्या गम जो एक और नाम दे मुझको ज़माना,
उठे मेरे नाम पर फ़िर एक और फ़साना -
माना मुझे हर ज़ुबाँ पर रहने की हैं आदत,
डर है कि नाम कहीं उसका न निकल आए
गुमनाम ही ....
(१९९६ में रचित, अपनी एक पुरानी डायरी से)
Tuesday, May 12, 2009
एक कहानी अनकही
पुकारा मुझे, तेरा नाम लेकर।
टटोला गया फ़िर से वो रिश्ता,
जो रह गया था गुमनाम होकर।
चुपचाप निकल आई थी आगे
यह बदनाम ज़िन्दगी मेरी
छोड़कर उजियारे दिन तेरे
लेकर अपनी रातें घनेरी ।
स्याह रात की इस चादर में,
ना थी कभी कोई उम्मीद मुझे।
सहलायेगा इस कदर -
मेरा बेचैन साया उठकर मुझे।
एक हसरत जो मैं समझा था कि
दफन आया हूँ तेरे दर पर कहीं।
रूह से लिपटकर साथ चली आयी हैं,
अब सुनाती हैं रोज एक कहानी अनकही।
Wednesday, April 29, 2009
मेरा ख्याल तो आया
मुझको किस कदर तमाशा बनाया।
खैर अच्छा हुआ क्योंकि -
तमाशा देखते हैं ज़माने वाले
इसी बहाने, उन्हें मेरा ख्याल तो आया।
किसी हाशिये पर अनजान ही
कट जाती जिंदगी तन्हा मेरी,
चलो, अब सबकी जुबान पर
तेरे नाम के साथ मेरा नाम तो आया।
इसी बहाने, उन्हें मेरा ख्याल तो आया।
अब मुझसे मुखतिब हैं ज़मानेवाले
आज जिंदा हूँ पर कल मिलही जायेंगे
तेरी बेरुखी ने सच, एक फ़साना तो बनाया
इसी बहाने, उन्हें मेरा ख्याल तो आया।
Monday, April 6, 2009
निःशब्द प्रेम प्रतिज्ञा
सीले सिरहाने पर रख छोड़ा हैं ,
एक तेरा स्वप्न अधूरा गीला सा
तुम हो जिसमे मैं हूँ और
वो वर्षों का एकाकीपन हैं
तेरी लाज के आँचल पर,
अब तक ठिठका मेरा मन हैं।
सिमटे सकुचे तुम बैठे थे जैसे ,
उस पहली अपनी मुलाकात में ।
अब भी वैसे ही मिलते हो मुझको,
हर भीगी सीली श्यामल रात में ।
अपनी मृग-चंचल आँखों में
एक मदहोश शरारत से -
निःशब्द ही कह जाते हो ,
चिर-पुरातन अपनी प्रेम-प्रतिज्ञा ,
जिसके बंधन में ही ,
मेरी मुक्ति का सार छिपा हैं।
जिसकी परिधि में ही
मेरा सारा संसार बसा हैं।
अपनी आहो से छूता हूँ ,
हर दिन तेरी कोमल श्वासों को ।
अपनी तृष्णा की तृप्ति को
पीता हूँ तेरी प्यास के प्यालों को ।
स्वप्न रहे थे तुम,
स्वपनों में ही पाता हूँ ।
अपनी निःशब्द प्रेम प्रतिज्ञा को
ऐसे ही हर शाम निभाता हूँ।
Monday, March 16, 2009
कभी तू भी मुझे मेरे नाम से बुला।
आँखों से जता, होठो से बता,
कभी तू भी मुझे मेरे नाम से बुला।
क्या देखता हैं तू, ज़माने की तपिश,
इश्क का हैं यह खेल मेरे यार! गर हैं-
तो फ़िर तू भी जल मुझको भी जला
कभी तू भी मुझे मेरे नाम से बुला।
इश्क को चुपचाप सिसकियाँ भरकर,
दबे पाँव गुजर जाने की हैं आदत।
आह-ऐ-दिल सुन औ' मुझको भी सुना
कभी तू भी मुझे मेरे नाम से बुला।
कितने रांझे भटक गए हीरों की तलाश में,
कितनी शमायें बुझ गयीं पतंगे की आस में,
न ठहर, कदम दो कदम ही, मेरी ओर तो बढ़ा
कभी तू भी मुझे मेरे नाम से बुला।
बेनाम किरदारों की कहानी भुला देते हैं ज़माने वाले ,
तेरे गम पर हँसते हैं, तेरे साथ आंसू बहाने वाले,
नाम ने दे इस रिश्ते को पर एक अफसाना तो बना,
कभी तू भी मुझे मेरे नाम से बुला।
Thursday, February 12, 2009
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई
इस कविता की रचना मैंने सन् २००० के अन्तिम मॉस में अपनी अर्धांगिनी के लिए की थी। और यह कविता आज भी मेरे दिल के करीब हैं।
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई।
प्रेम, सिर्फ़ रुदन ही नहीं उल्लास भी हैं ।
प्रेम खोने का डर नही, पाने की प्यास भी हैं।
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई ।
मैं तो जी रहा था, शुष्क जीवन मरुथल में।
मृग मारिचिकाओं के मोह से आहात पल-पल में।
तुम सावन की पहली बदरी बन जीवन पर छाई।
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई .
जीवन भोर पर, निशा निवास था चिर स्थाई ।
हर्ष ज्योत्सना खंड-खंड, तिमिर सघन प्रचंड ।
तुन, उषा की प्रथम रश्मि बन जीवन में आई।
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई ।
भय के धूमल अंधड़ में, छूट रही थी सांसो की माला।
सूना सूना ही था, जीवन में खुशियों का प्याला।
तुम, सोम-सुधा की मृदुल फुहारबन जीवन पर छाई।
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई .
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई।
प्रेम, सिर्फ़ रुदन ही नहीं उल्लास भी हैं ।
प्रेम खोने का डर नही, पाने की प्यास भी हैं।
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई ।