प्यारे पथिक

जीवन ने वक्त के साहिल पर कुछ निशान छोडे हैं, यह एक प्रयास हैं उन्हें संजोने का। मुमकिन हैं लम्हे दो लम्हे में सब कुछ धूमिल हो जाए...सागर रुपी काल की लहरे हर हस्ती को मिटा दे। उम्मीद हैं कि तब भी नज़र आयेंगे ये संजोये हुए - जीवन के पदचिन्ह
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Tuesday, June 29, 2010

मुक्ति-कामना



प्रिय तुम!!
मुक्त कर दो मुझे,
प्राण परिधियों से...
दिग्भ्रमित करती अविरत 
जीवन मोहनियों* से 

मैं प्रज्वलित निष्प्रदीप
व्यर्थ होता जीवन-यज्ञ
विचलित मन-खग
स्थिल हो रुकते पग
प्रीत कर पिंजर से
मुष्ठियों में ढूंढता नभ

श्वास क्षितिज के पार
जहाँ बिंदु भर लगता
व्योम-विस्तार
काल-खण्डों की -
कल्प-गणना से विरक्त
अनन्त से अनन्त तक
दृष्टव्य जहाँ उन्मुक्त सत्य
शुभ्र, सनातन किन्तु अव्यक्त

लेकर वही उसका पथ-प्रखर
हे कमनीय! बन कुंदन
शाश्वत जाऊँ मैं निखर
प्रिय तुम!!
मुक्त कर दो मुझे,
प्राण परिधियों से...


* जीवन मोहिनियों  = पंच-विकार; काम, क्रोध, लोभ मोह और अहंकार

Tuesday, June 8, 2010

केहि बिधि मिट्टी से मिट्टी मिल जावे...

मित्रों,

ऐसे ही फुर्सत के कुछ लम्हों में एक ताल के किनारे बैठे हुए, मेरोरियल डे के दिन (मई ५, २०१०) चंद पंक्तियाँ मन में उपजी...उन्हें सूफियाना रंग और विस्तार  देकर प्रस्तुत कर रहा हूँ,  वैसे तो सूफी गीतों पर मेरी कोई पकड़ नहीं हैं पर फिर भी विश्वास है कि आप मेरी इस कोशिश को सदैव की भांति अपना स्नेह देंगे.
सादर,
सुधीर


कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे
दाग देय देंह को कोई, या मिट्टी में मिट्टी दबवाबे
पिया-मिलन की आस है, बाबुल के रिश्ते  बिसरावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

सुलगी जब नयनन की बाती, दहकी सांसों से छाती
बहुत जली पीहर मैं तो, विरह की तपन में मैं तो
कोई तो पिय को बतलावे, लेप-चंदन से मिट न पावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

पीहर के खेल-तमाशे, कुछ बाँधे कुछ समझ न आवे
पिय ने बिसरा मोको पर जियरा पिय को न बिसरावे
इक नेह की डोर से बँधे हैं कैसे कोई बंधन छुटबावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

जग की है रीति पुरानी, पीहर का कितना दाना पानी
पग-फेरे की बात थी अपनी, निठुर की देखो मनमानी
कैसे भूले वो प्रेम-कहानी, कोई तो उनको याद करावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे
दाग देय देंह को कोई, या मिट्टी में मिट्टी दबवाबे
पिया-मिलन की आस है, बाबुल के रिश्ते बिसरावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

Tuesday, June 1, 2010

उसका आया है ख़त कि भूल जाऊं उसे


आया है ख़त उसका कि अब भूल जाऊं उसे
ग़ज़ल न रही वो मेरी, अब न गुनगुनाऊ उसे

रहा यतीम ख्याल सुनहरा तेरे मेरे रिश्ते का
जब न कोई निस्बत तुझसे तो क्या अपनाऊँ उसे

उफ़क तक भी न पहुंचा अहसास अक़ीदत का
खौफज़दा सजदों का सच, मैं क्या बतलाऊँ उसे

बढ़ गया बहुत आगे वो लेकर नाम तिजारत का
दिल औ' जज्बातों की बात अब क्या समझाऊँ उसे

सच कहता है वो बनकर रहनुमा हम गरीबों का
हालात-ए-मुफलिसी बयाँ करके  क्यों झूठलाऊँ उसे

नाम न दे सके जिस अहसास को दुनियादारी का  
क्यों ज़रूरी हैं कि मैं किसी नाम से बुलाऊँ उसे 

हद-ए-आईने में कैद हैं एक शख्स दास्ताँ तुझ सा
छोड़े खामोशियों की चिलमन,  तो पहचान पाऊँ उसे

Tuesday, May 25, 2010

मृत्यु से अनुरोध


शरणाकांक्षी अंतर्मन
आहात देह
खंडित दीप
च्युत नेह

रह रहकर
गिरता मन
ज्योति दण्डित
तम सघन

नयन स्थिल
मेधा विकल
प्रतीक्षारत विभा
रवि विह्वल

आलंबनाकांक्षा
अलिंगनानुरोध
श्वांस समर्पण
जीवन प्रतिरोध

पाप-पुण्य से दूर
स्वर्ग-नर्क से इतर
हो साथ तेरा
वही मार्ग प्रखर

हो स्पर्श तेरा
पावन-पुनीत
भाव पराजय का
हो शुन्य प्रतीत

तुम जयी बन
ले जाओ मुझसे
मेरे झूठे अहम्
जो निर्वासित जग से

Saturday, April 24, 2010

कुछ कथाओं की अपूर्णता ही देती हैं तृप्ति ...



कुछ कथाओं की अपूर्णता ही देती हैं तृप्ति ...
कौन जाने अन्यथा जीवन-पूर्णता भी क्या मुक्ति?

स्वयं तराशता परिधियाँ अपनी  कामनाओं की
उकेरता अदृश्य-खंडित सीमायें भावनाओं की
हैं तो असंख्य आकांक्षाएं सहज समाधान की
किन्तु दृष्टव्य नहीं कोई राह मुक्त-व्यवधान की

प्रस्तुत विविध विकल्प अनन्त वैभव विस्तार के
तोल-मोल भाव लग रहे हैं भावों के संसार के
विक्रयशील मनुज, मार्ग कई हैं आत्म-व्यापार के
उऋण न देह यहाँ, तो पथ क्या हों प्राण-प्रसार के

अदृश्य जीवन-मंथन अनवरत चल रहा प्रारब्ध से  
उपजता मात्र हलाहल, विलुप्त रत्न सभी  प्रसाद से
वरण करता रहा, क्या अपेक्षित करूँ शिवाराध्य से
मोक्ष-तृष्णा से मरूं या तृप्त प्रयाण  हो प्रमाद से

कौन जाने अन्यथा जीवन-पूर्णता भी क्या मुक्ति?
कुछ कथाओं की अपूर्णता ही देती हैं तृप्ति ......

Wednesday, March 31, 2010

गुमनाम सी मौत


कल जो मरा गली के नुक्कड़ पर,
गुमनाम सी मौत,
वो शायर ही होगा शायद....

ताउम्र अहसासों की कुची से
रंग भरता रहा जिंदगी के,
शफाक से कागजों पर...
रंग ही न बचे उसकी -
ज़िन्दगी के मुहाने पर 
कितनी सादगी से मौत ने  भी
 थामा उसका बदरंग सा दामन...
वो शायर ही होगा शायद....

लब्जों की चिलमन से
कई बार झाँका था उसने
दिलकश-हसीं जिंदगी का चेहरा
पर शब्द भी तो इंसान के जाये थे
कब तक साथ निभाते?
एक उफ़ भी न कह सका वो 
थामा जब मौत ने चुपके से उसका दामन ...
वो शायर ही होगा शायद....

सबके दर्द की चुभन,
कुछ आंसू, एक टीस
महसूस करता रहा ज़िन्दगी भर...
गढ़ता रहा नज़्म का चेहरा
भरता रहा बज़्म में दर्द के प्याले
पर एक हमदर्द भी न मुनस्सर हुआ
थामा जब मौत ने उसका तन्हा दामन
वो शायर ही होगा शायद....

कल जो मरा गली के नुक्कड़ पर,
गुमनाम सी मौत,
वो शायर ही होगा
 यकीनन!!

Tuesday, February 23, 2010

क्या कहता वो, बस रो पड़ा मेरा नाम लेकर



पूछा जो हाल-ए-दिल, साकी ने  दो जाम देकर
क्या कहता वो, बस रो पड़ा मेरा नाम लेकर

गम-ए-हिजरा में होती हैं ऐसी भी हैं अदाएं,
बतियाते हैं वो, आईने से मेरा नाम लेकर

हालात का मारा है शायद, होगा खौफज़दा भी,
सुनाता है वो, फ़साना अपना मेरा नाम लेकर

गर्दिश में बदलती हैं, तहजीबो-अदब की निगाहे,
बुलाते हैं वो, न अब मुझको मेरा नाम लेकर

हमशक्ल न सही, हममिजाज़ तो होगा वो शख्स
भुलाते हैं वो, जिसे दास्ताँ मेरा नाम लेकर

Tuesday, February 2, 2010

अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित,

मित्रों,
कल अपने जन्मदिन पर कुछ क्षण ऐसे भी आये, जब चहुँ ओर की उल्लास और शोर शराबे के बीच मैं आत्म मनन में जुट गया - जीवन के बारे में सोचने लगा. (शायद बढती उम्र का असर होगा!!) . उन्ही विचारों को कविता का रूप देकर आपसे साँझाकर रहा हूँ. आशा है कि आप मेरी इस आत्म-चिंतन को परोसने की धृष्टता को अपना प्रेम देकर क्षमा करेंगे.
सादर,
सुधीर




अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित,
या जीवन-लालसा में व्यर्थ श्वांस-घट रिक्त ...

दो-राहों से पटे समर में, कब संशय-मुक्त
जो पथ पकड़ा क्या वही सहज उपयुक्त
न नाप सका जिन पगडंडियों की लचक
क्यों उनकी कमनीय कामनाओं से व्यथित?
अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित.... 

अधजल गागर का हैं यह थोथा स्वर,
या शुन्यता देती चुनौती मुझको प्रखर
मोक्ष मेरा क्या ज्ञान-सिन्धु आप्लावित
मुक्ति-मार्ग होगा श्रम-साध्य स्वेद लिप्त
अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित....

मखमली स्वप्निल संभावनाओं से सुसज्जित
इच्छाओं आकांक्षाओं की अट्टालिकाओं से सृजित
क्या होगा मेरा स्वर्णिम भावी-भविष्य परिलक्षित
या कपोल-कल्पित तृष्णामयी होगा जीवन व्यतीत
 अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित....

काल के कपाल पर रहूँगा एक अरुणिम तिलक,
यश कीर्ति की रश्मिया लेकर फहरेगा मेरा ध्वज
या कौन जाने? मरू में अंकित एक रेखा की तरह
क्षण भर में ही हो जाये मेरा अस्तित्व विलुप्त
अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित....

अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित,
या जीवन-लालसा में व्यर्थ श्वांस-घट रिक्त ...

Tuesday, January 12, 2010

बचना वो हँसकर मिलता है दोनों बाहें फैलाएं




बचना वो हँसकर मिलता है दोनों बाहें फैलाएं
मुश्किल में होगा न जाने कौन सा काम बताए

चुनावी मौसम था, वादों की बयार में गुजर गया
आओ अब खुद सुलझाएं अपनी अपनी समस्याएँ 

रही बाट जोहती शिक्षक की किनती सारी कक्षाएँ
ट्युशन से पार लगेंगी इस साल की भी परीक्षाएं

सच ही होगी खबर दंगों की आज के अखबार में
सरकार ने कहा सब विपक्ष ने हैं फैलाई अफवाहें

दाल-रोटी महंगी हुई पर जीने की और विवशताएँ
घी-लकड़ी के दाम हैं दुने बड़ी महंगी पड़ेगी चिताएँ

न कर उम्मीद दास्ताँ किसी भी पीर औ' मुर्शिद की
बदलनी किस्मत हैं तुझको तो खुद गढ़ अपनी राहें

Tuesday, December 29, 2009

'एक्सक्लूसिव' खबर





कल भूख से मर गए कुछ गरीब बच्चे मेरे शहर में
यह हृदय-विदारक खबर जब किसी चैनल पर न आई
इक नए युवा पत्रकार के दिल की धड़कन घबराई
होकर परेशान उसने यह बात अपने संपादक से उठाई

संपादक ने कहा - बड़े नौसिखिया हो यार !
किसने बना दिया हैं तुमको आज का पत्रकार?
जो मरे वो तो बच्चे थे, बस  भूखे  लाचार
इसमें इन्वोल्व  न कोई नेता, भाई या तडीपार

खबर मैं  छाप दूं अभी पर इससे चैनल क्या पायेगा
यह मुद्दा मुश्किल  से दस सेकंड भी न चल पायेगा
कुछ दिन पड़े रहने दो लाशें, मुनिसिपल इश्यु हो जायेगा
तब यही खबर अपना चैनल एक्सक्लूसिव ले आएगा

चिंता न करो, तुम्हारा रिसर्च बेकार नहीं जायेगा
जब खबर लायेंगे तो ये ग्राउंडवर्क  काम आयेगा
भूलना मत, दो चार फोटो आज की भी  लेते आना
 मुश्किल होता हैं वरना एक्सक्लूसिव खबर का बैकग्राउंड बनाना

पहले बेचारा पत्रकार चकराया
और फिर  अपनी चिंता जतायी,
मान्यवर अगर नगरपालिका वालों ने
उन बच्चों की  लाशें आज ही हटाई

संपादक खिलखिलाया और फिर हल्के से फुसफुसाया
नौसिखिये हो इसलिए तुमने यह मुद्दा उठाया
चुपचाप गायब होती लाशों का मसला और बिक जायेगा
साजिश का एंगल  तो चैनल की टीआरपी बढाएगा

Tuesday, December 15, 2009

माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा




माँगा खुदा से अब  न हो रहबर ज़माना मेरा |
बस हुआ संगदिल रहनुमाओं से दिल आजमाना मेरा ||

अपनी अपनी दूकान पर यहाँ सबके अपने रसूल,
बिकते मजहब,  बिकती मुहब्बत और बिकते उसूल
अश्कों को कीमत, हर अहसास को तिजारत कबूल
यूँ ही अपने वजूद के तोल-मोल  भाव तलाशना  मेरा

बस हुआ ठगते  रहनुमाओं का दाम लगाना मेरा
माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा



झूठ की सियासत में, हमेशा सच बदलते लोग
झूठे वादे, झूठी कसमे, झूठी रस्मे निभाते लोग,
झूठे फलक के नीचे ऐतबार के कच्चे-घर बनाते लोग
ऐसी ख्याली दुनिया में इक सब्जबाग तलाशना  मेरा

बस हुआ झूठे  रहनुमाओं का दिल बहलाना मेरा
माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा



फरेब से बचने को फरेब के जाल बिछाती दुनिया
कुछ ऊँचा उठने को सबके सर चढ़ जाती दुनिया
मतलब से नए खुदाओं के सजदे में सर झुकाती दुनिया
ऐसे में अपनी खुदगर्ज अजानों के नए  मायने तलाशना मेरा

बस हुआ फरेबी रहनुमाओं पे भरोसा जाताना मेरा
माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा



मंजिले खोकर भूले रास्ते को घर बनाते बन्दे
हक-ए-आरजू में फर्ज पर मिट्टी गिराते बन्दे
भुलाके दीन-ओ-ईमान, रहमत के कसीदे रटाते बन्दे
ऐसे भूले-बिसरे अरमानों में गुमशुदा ज़मीर तलाशना मेरा

बस हुआ  भटके रहनुमाओं को सरपरस्त बनाना मेरा
माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा


माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा
बस हुआ संगदिल रहनुमाओं से दिल आजमाना मेरा

Tuesday, December 8, 2009

हुआ इश्क में रुस्वां, इक नई पहचान ढूंढता हूँ



मुसाफिर हूँ यारों, इक शहर अनजान ढूंढता हूँ
हुआ इश्क में रुस्वां,  इक नई पहचान ढूंढता हूँ

मजहब के वादों पर मरते  रोज़ इंसान देखता  हूँ
बता दे जो खुदा को मेरा दर्द,  वो अजान ढूंढता हूँ

दहशत में जीता है, बनकर तमाशाई मेरा  शहर
फूँक दे जो मुर्दा दिलों में जान, वो इंसान ढूंढता हूँ

सरहदों के नाम पर, बाँट ली है यह ज़मी सबने,
पनाह दे जो हर किसी को, वो आसमान ढूंढता हूँ

तंग-हाल जीकर भी, क्या पाया  है सुकून किसी ने
बेच के उसूल, इस दौर में रास्ता आसान  ढूंढता हूँ

दुश्वार है बेखौफ, कुछ सुनना-सुनाना इस जहाँ में
जहाँ हो गुफ्तुगू खुद से, वो इलाका वीरान ढूंढता हूँ

असर कुछ तो हैं उसकी जफा का  'दास्ताँ' तुझपर,
देख के वो नज़रें फिराता है औ' मैं अहसान  ढूंढता हूँ

Tuesday, December 1, 2009

मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!





बड़ी मुद्दत के बाद आज तन्हा हूँ,
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!
आंसू न पोछो, मुझे धीर न दो
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

अपनों  को परखने की,
मुझको न थी आदत ही कभी,
वो छलतें है मुझको, तो छल  लेने दो.
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

माँगा ही किया है दुनिया ने हरदम,
मुझसे कीमत हर रिश्ते नातों की
आज देती हैं वो धोखा तो दे लेने दो.
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

जिन्दा रहने की है शर्त अगर,
ताउम्र सांसों की सलीब उठाना,
तो पल-पल मर के भी जी लेने दो.
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

सजदे में ही रहा जीता मैं,
बचता बगावत के इल्जामों से,
अब कटता सर मेरा, तो कट लेने दो.
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

गैर-ज़रूरी  है अब दुनियादारी में
इन बेमतलब उसूलों का सबब.
कुछ बेचता हूँ मैं, तो बिक लेने दो
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

औरों  के बनाये  निज़ामों  पर,
जीना ही तो रही किस्मत मेरी,
(अपनी इक) ख्वाहिश पर मरता हूँ, तो मर लेने दो
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

बड़ी मुद्दत के बाद आज तन्हा हूँ,
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!
आंसू न पोछो, मुझे धीर न दो
मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

Tuesday, November 24, 2009

हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!




हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

 जब एक कट-चाय समोसे से,
हम यह दुनिया नापा करते थे,
एक ख्याली धागे के दम पर,
हम  हर सिस्टम बांधा करते थे
यूँ तो हर बात फलसफे पर होती थी
एक हम ही ज्ञानी-विज्ञानी थे  बस्ती  के
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के  !!

हर जटिल विषय की कक्षाएँ
केवल  जीकेडी पर लगती थी
सत्तर प्रतिशत अटेनडेंस पाने को
सिर्फ प्रॉक्सी की कौडी चलती थी
यूँ तो (असाइनमेंट) टोपिंग में हम शातिर थे  पर
कुछ कर जाते थे श्रमदान जूनियर्स जबरजस्ती से
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

वैसे तो एक ख्वायिश की उलझन में
अक्सर कितनी राते जागा करते थे,
पर हर रात परीक्षा से पहले हम,
हर दिन पढने की कसमे खाया करते थे
यूँ तो एक साल में पढना मुश्किल था पर
कई पोथी घिस जाते थे एक रात में चुस्ती से
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

एक अदद पिक्चर की खातिर हम,
हॉस्टल में सबसे चिल्लर  माँगा करते थे
मुफलिसी के दौर  रहे तो सब मिलकर
कपूरथला गंजिंग की गलियां नापा करते थे
यूँ तो एक मैगी  से  दस-दस खाया  करते थे
उधार चुकाने को दिखला देते थे दांत बत्तीसी  के
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

हर अखबारी कतरन पर जमकर ,
हम सबके रिश्ते छाना करते थे,
सबकी प्रेम-कहानी पर हँसते हम पर
'उससे' मिलकर बगले झाँका करते थे
यूँ तो हर बात खनक से होती थी
पर क्या समझाते उसको कारण चुप्पी के
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

* ~ * ~ * ~ * ~ * ~ * ~ *
यह कविता अचानक फेसबुक पर एक लंगोटिया यार के मिल जाने पर मन से निकली आह से उत्पन्न हुई है. उससे बात करते करते कॉलेज के पुराने दिन याद आ गए. जब परीक्षा से एक रात पहले पाता चलता था कि एक पूरी कि पूरी किताब कोर्स में हैं जिसका हमे पाता ही नहीं था ...हर जटिल विषय की क्लास से हम ऐसे गायब रहते थे जैसे कि गधे के सर से सींग... सत्तर प्रतिशत उपस्थिति दर्ज हुई नहीं कि उस क्लास से हमारा डब्बा गोल, उसके बाद तो हम केवल ढाबों पर चाय की चुस्की का आनंद लेते मिलते थे. सांख्यिकी से ज्यादा मेंहनत पिया-मिलन वाले जोडों की गणना में करते थे. उस समय हम समाज और संसार के हर विषय पर बहस करने का माद्दा रखते थे और संसार की समस्त समस्याओं का समाधान तो हम बैठे बैठे चुटकियों में निकाल लेते थे. बस ढाबे की एक सांझी चाय और समोसे का भोग लगता रहे (चाहे उधारी पर ही क्यों न ) तो सामायिक विषयों से लेकर लोकल प्रेम प्रसंगों पर हमारी ज्ञान ग्रंथि खुली रहती थी. क्योंकि यह रचना दिल की अभिव्यक्ति है इसलिए मैंने कई परचित देशज (और विदेशज) शब्दों को भी नहीं बदला है. कुछ अप्रचिलित शब्दों की परिभाषा निम्न  है.

  •  जीकेडी: गुप्ता का ढाबा. लखनऊ आई.ई. टी (इन्जिनेरिंग कॉलेज) के साथ में चलने वाला ढाबा. हमारे छात्र-जीवन में सारे के सारे ढाबों का विलायतीकरण उनके नामों के संक्षिप्त करके ही किया गया था जैसे मिश्रा का ढाबा यमकेडी, गुप्ता का ढाबा जीकेडी. इस ढाबों ने जितने सपनों को बनते बिगड़ते देखा हैं शायद ही आस-पास को कोई ईलाका उसकी बराबरी कर पाए - चाहे वो नौकरी या छोकरी के सपने हो या पनपती छात्र-राजनीति की महत्वाकांक्षाएं.


  • टोपिंग: प्रोजेक्ट या असाइनमेंट की नक़ल (टोपने अथवा टीपने) की कला; जो अक्सर एक घिस्सू छात्र के समाधान निकालने के बाद अक्सर स्वयं या जूनियर्स द्वारा कक्षा के अन्य  उन्मुक्क्त विचारों वाले छात्रों के लिए प्रतिलिपि बनाने की कला के लिए प्रयुक्त होता है.

  • गंजिंग = लखनऊ के प्रगतिशील हजरतगंज के इलाके में जीवन के फलसफे और रंगीनियों को तलाशते हुए हम जैसे फक्कडों का घूमना

Tuesday, November 3, 2009

काश! हम भी एक मौसमी दरख्त हो पाते




मौसम की करवट पर, 
हवाओं की छम-छम पाजेब पर,
आशिक़ मिजाज पेडों को
जब रंग बदलते देखता हूँ
तो सोचता हूँ क्या यही प्यार है,
इश्क का इज़हार है

एक मौसम का साथ,
चंद दोपहरियों का ताप
जिनमे साथ कुछ धुप सही, कुछ छाया
हवाओं से फिर न जाने क्या रिश्ता बनाया
कि उनकी सर्द होते स्पर्श के स्पंदन से
पाकर एक अनुभूति अपने अंतर्मन में
कुछ यूँ पसर जाते हैं,
अपने पतझड़ के दर्द को भुलाकर भी,
यार के लिए रंगीन नज़र आते हैं ....
मौत के आगन में, दर्द  के दामन में 
दीदार-ए-यार से गुल सा खिल जाते है

(और एक हम हैं कि )
एक मौसम नहीं सौ ऋतुयें देखी हैं,
एक छत जो  ईंट-ईंट जोड़ी है
उसके नीचे एक रिश्ता भी न रच पाते है
तेरे मेरे शब्दों में  खुद अपनों से कट जाते हैं
अपने अपने गम का पत्थर लेकर
मुकम्मल रिश्तों को भी चुनवाते हैं 
अपनी गुरूर की मैली चादर
झूठी खुशियों  की  खातिर इतना फैलाते हैं
सिर्फ गम के ज़ार-ज़ार पैबंद नज़र आते है

काश! हम भी एक मौसमी दरख्त हो पाते
सांसों की शाख छोड़ने से पहले
एक बार ही सही ,
यार के लिए यूँ ही मुस्कुराते,
जाते जाते उसका दामन रंगों से भर जाते !!
काश! हम भी एक मौसमी दरख्त हो पाते !!

Tuesday, October 20, 2009

दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ





दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ
पर कोई क्या बताए क्यों थी दिलों में दूरियाँ

दिल में रख छोड़ा था एक ख्याब सुनहरा सा
जिनमे हमेशा वो रहा जिसके ख्याबों में मैं ही कहाँ था?
और क्या कहें,  क्या रही हमारी मजबूरियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ

उम्र-भर बैठे रहे, जिसकी राहों में हम नज़रें बिछाए
मुझसे मिला वो, तो उसके पास मेरे लिए वक्त ही कहाँ था?
और क्या कहें, क्या रहीं ज़माने भर की मसरूफियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ

मंजिलों की तलाश में हम चले तो सब साथ-साथ थे,
जिसके साथ मैं चला, उसके हाथ में मेरा हाथ ही कहाँ था?
और क्या कहें, क्या रही मेरी बदनाम कहानियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ

हाल-ए-दिल कहने को लिखी जिसके नाम गज़लें तमाम,
उनको सुनने को वो, महफ़िल में तन्हा आया ही कहाँ था?
और क्या कहें, क्या रही उस शाम मेरी खामोशियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ

दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ
पर कोई क्या बताए क्यों थी दिलों में दूरियाँ


Saturday, October 17, 2009

जितना संभव हो पथ आलोकित करें (दीवाली शुभकामनाएँ)



जिस प्रकार दीपावली के असंख्य दीपो के अथक और निस्वार्थ श्रम से तिमिर प्रभावहीन हो जाता और अमावस की रात भी पूनम के तरह मधुर लगती हैं. उसी प्रकार आपका जीवन भी निस्वार्थ और अथक मानवीय श्रम से यश और कीर्ति की ज्योत्सना से आलोकित होकर अज्ञान और दारिद्रय के तमस पर विजय प्राप्त करे.  इसी कामना के साथ आज की कविता आपको समर्पित है.  


दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ
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 अमावस की काली रातों में
जगमग तारों सा ह्रदय धरें,
चन्द्र-राह ताकें क्योंकर हम,
जितना संभव हो पथ आलोकित करें

देवालय आलोकित किए कई,
आओ अब कुछ यूँ जलें
तूफानों से जूझती जो कश्ती,
उसके हम आशा-दीप बने

कितने घट जो अब भी हैं रीते-अंधियारे
अज्ञान-पाश में फँसकर खुद से भी हारे
उनकी सूनी चौखट को रौशन करने को,
आओ हम सप्त-सुरों  के ज्योति-गीत बने

जितना संभव हो पथ आलोकित करें !!

Tuesday, October 6, 2009

दीप-पीड़ा



कभी-कभी ऐसा भी होता है,
जिंदगी के रोज़ बदले चेहरों में,
चुपचाप जलते दीप के नीचे
खामोश पनपते अंधेरों में |
मांगता हैं कोई, मौन ही
अपना अंश का खोया प्रकाश,
बाँटकर चहूँ ओर रश्मि-उल्लास|
फिर देखकर अपना नीड़ निराश,
सोचता है अनवरत निर्विकार
देकर वेदना के स्वरों को विस्तार,
बिना चीत्कार, बिना हाहाकार,
क्या यही मूल्य है, जग-कल्याण का?
सर्व-हिताय शीरोधार्य ज्योत्सना प्राण का?      
विस्तृत अनन्त तक मेरा ज्योति यश
मेरी परिधियों में ही क्यों पनपता तमस?
समरग्रस्त मैं जब सदैव ही तिमिर-प्रसार से
ठहरा कृष्णांश  मेरे सानिध्य, किस अधिकार से?

कौन समझाए उन भावुक युद्धरत बिचारों को |
सबके लिए स्वयं दहकते , राख होते अंगारों को  |
जिन  अंधेरों से वो उम्र भर लड़ते हैं,
वो उनकी ही पनाहों में ही पनपते हैं,
दोनों  ही  पूरक हैं एक दूसरे के,
बिना  परस्पर अस्तित्व दोनों ही अधूरे से   |
यदि तिमिर पूर्णत: मिट जायेगा,
फिर नव दीप कौन जलाएगा  ?
नकारे जाते हैं दोनों दीप और अँधेरे,
आते  ही  मृदुल सुबह सवेरे |
स्वार्थवश छलता हैं दोनों को ही रातभर कोई,
उनके अपने अपने धर्म के छद्म नामों  पर ,
रश्मि उत्सव की पुरातन रीति और
तमस-स्वभाव के अर्थहीन इल्जामों  पर |
हर तिमिर-पग पर प्रज्वलित  दीप कई
हर साँझ  की यही नित्य  क्रीड़ा  हैं |
अपने अस्तित्व से ही लड़ते दीपक को
कौन समझाए वस्तुतः क्या पीड़ा हैं?

Tuesday, September 29, 2009

...कोई तो मेरा किस्सा पुराना मिले


वो पलटते हैं मेरी डायरी के सफे कि कोई तो मेरा किस्सा पुराना मिले,
हर नज़्म नाम उनके औ' वो कहते हैं कोई तो मेरे यार का इशारा मिले

कुछ उनकी नाजों-अदा और कुछ मेरी यह चुप रहने की आदत
कभी तो समझे वो इन ज़ज्बातों को तो सबको एक फ़साना मिले

अनुभव की चांदी जब जुल्फों पर छाने लगे औ' आइना चेहरा झुठलाने लगे
मेरी आँखों में झाँककर सँवारना ख़ुद को , तब भी तुझको वो चेहरा सुहाना मिले

हुस्न की हो मूरत अभी तुम, कई सर तेरे दर पर सजदे में झुक जायेंगे
ढलती उम्र में देखना उस चौखट को, शायद हम सा ही कोई दीवाना मिले

ख़बर हैं कि फ़िर कत्ल हुआ है उनके शहर में आशिक़ कोई ,
देखना कोई जाकर दोस्तों कहीं वो ही खंजर न पुराना मिले

मैं मर भी रहा हूँ यूँ करके कि मेरी मइयत में तो आयेंगे
कुछ तो 'दास्ताँ' उनसे खुलकर मिलने का बहाना मिले

Tuesday, September 22, 2009

क्या विराम दूँ अभिव्यक्ति को?




क्यों मन में एक शून्य हैं पनपा,
क्या विराम दूँ अभिव्यक्ति को?

 पाषाण हूँ, मैं कोई बुद्ध,
पक्ष में, मैं किसीके विरूद्व
क्यों फ़िर हृदय-संवेदना च्युत,
सिर्फ़ शून्य! प्रवाह सभी अवरुद्ध।।
मुझे कामना की प्यास ,
मुझे निर्वाण की कोई आस।
विदेह ह्रदय हर भावना से मुक्त,
क्यों फ़िर ह्रदय न  गीत साधना से युक्त?


नहीं पसीजता लेस भर हृदय
किसी भी करुण क्रौंच-क्रंदन पर,
नहीं दहकता सूत भर ह्रदय
आज स्वयं के भी मान-मर्दन पर
दिग्भ्रमित पथिक अथक ढूंढता हो
मंजिले ज्यूँ मध्य के पड़ाव पर
शब्द वसन लपेटे खडा हूँ, नग्न बाज़ार में,
क्यों फिर न टपकता काव्य-अश्रु  अभाव  पर?


बौधिक हो रही है काव्य-रचना,
दर्द नहीं इसमे संसार का,
रंगा-पुता हैं हर शब्द पर,
अंश नहीं हैं इसमें प्यार का,
सजे हुए हर्फ बेतरकीब कई  ,
कोई सलीका नहीं इनमे इज़हार  का
साज-सज्जित और अलंकृत हैं छंद
क्यों फिर भाव नहीं हैं कतिपय अहसास का ?


क्यों मन में एक शून्य हैं पनपा,
क्या विराम दूँ अभिव्यक्ति को?


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