प्यारे पथिक
Wednesday, October 27, 2010
कभी तो मिलो मेरे ख्यालातों के मोड़ पर
Wednesday, August 4, 2010
तुम्हारा नाम
Saturday, July 10, 2010
तुम
आज अपने विवाह की १०वी वर्षगांठ पर अपनी प्राण-प्रिया के लिए चंद पंक्तियाँ लिख रहा हूँ...मेरी हिंदी की डाक्टर साहिबा पत्नी को हो सकता है यें कविता काव्य-शास्त्रों के मापदंडों पर खरी न उतरती हुई प्रतीत हो... पर मैं इस सार्वजानिक मंच से बस इतना ही कहना चाहिंगा - यदि भावों की अभिव्यक्ति कविता है, यदि ह्रदय की टीस कविता हैं, यदि अव्यक्त अभिलाषाओं की बातें कविता हैं, तो प्रिय, फिर ये मेरे ह्रदय-उदगार भी कविता हैं....
Tuesday, July 6, 2010
तेरी यादों की है रहमत, हम अकेले न होंगे
दिल टूटने का दिलकश फ़साना अपना इश्क
चलेगा तब भी जब फुसफुसाते घरोंदे न होंगे
हो जवाँ मिल ही जायेंगे आशिक़ कई तुमको
होगी महसूस तुम्हे भी ज़िन्दगी-भर की खलाएं,
होगी ग़ज़ल तेरे नाम, पर अहसास मेरे न होंगे
निभाता रह दास्ताँ तू रस्म-ए-मुहब्बत उम्रभर
Saturday, May 22, 2010
सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं
Tuesday, April 27, 2010
दर्द-ए-दिल दिल तक ही रखूँ, यह ज़रूरी तो नहीं
Friday, April 9, 2010
पुरानी तस्वीर
Tuesday, March 16, 2010
गम है कि जिन्दा हूँ, वरना खुशियों से तो मर जाता
दिल टूटा है होगा तूफां से तेरा सामना उम्रभर अब तो
रहमत उसकी जो हँसकर दिल लगाया भी, मिटाया भी
मेरे दामन को वरना कोई कैसे इन गजलों से भर जाता
हुई हैं कामयाब दास्ताँ कुछ तो रकीबों की बाते वरना
तुझसे मिलकर वो मुस्कुराता सा चेहरा न उतर जाता
Tuesday, March 9, 2010
तेरे तसव्वुर से मैं कह पाता, मैं वो सब जो कहना भूल गया
मालूम थी यें हकीकत मुझे फिर क्यों तुझसे कहना भूल गया
ताउम्र इबादत की जिसकी दास्ताँ, उसके सजदे में रहना भूल गया
Tuesday, February 16, 2010
कैसे सरेआम कर दूं तेरे कांधे के बोसे को
Tuesday, February 9, 2010
यह जवानी है मेरे दोस्त, इसे परदे क्या छिपाएं
Tuesday, January 26, 2010
बीता हुआ कल...
Tuesday, January 5, 2010
कतरा कतरा मैं बह जाऊंगा
आता ही नहीं हूँ मैं, तेरी दर पर दिल लगाने के डर से,
Tuesday, December 22, 2009
रात भर....
काश मुझको मालूम न होता ठिकाना तेरा
चर्चा रात भर, चलता रहा महफ़िल में मेरा,
Tuesday, October 27, 2009
तेरी रुसवाई से, मेरी बेवफाई का इल्जाम अच्छा है
Tuesday, October 13, 2009
साँसों में लिपटी पड़ी है मिट्टी, लोग उठाते क्यों नहीं.
Tuesday, September 29, 2009
...कोई तो मेरा किस्सा पुराना मिले
हर नज़्म नाम उनके औ' वो कहते हैं कोई तो मेरे यार का इशारा मिले
कभी तो समझे वो इन ज़ज्बातों को तो सबको एक फ़साना मिले
मेरी आँखों में झाँककर सँवारना ख़ुद को , तब भी तुझको वो चेहरा सुहाना मिले
ढलती उम्र में देखना उस चौखट को, शायद हम सा ही कोई दीवाना मिले
देखना कोई जाकर दोस्तों कहीं वो ही खंजर न पुराना मिले
कुछ तो 'दास्ताँ' उनसे खुलकर मिलने का बहाना मिले
Tuesday, September 15, 2009
क्या गिला करें हम अपने मासूम यार का...
क्या गिला करें हम अपने मासूम यार का।
किस किस से छिपायें नाम नादाँ यार का।
जिनके लिए बदनाम हुए, वो किस्से हमारे आम करे जाते हैं
कोई तो सिखाओ यारों उन्हें सलीका इश्क के इज़हार का ।
जिस पर भरोसा किया, उन्होंने ही तमाशा बनाया प्यार का
उम्र हुई न जाने कब आयेगा अब ये मौसम ऐतबार का ।
बहुत बेंचे हैं ख्याब उन्होंने, पल भर के खुलूस की खातिर
कौन जाने वो कब बंद करेंगे धंधा दिलों के कारोबार का ।
निगाहे यार नश्तर है और हुस्न औ'अदा खंजर उनके ,
हँसकर सहते हैं जुल्म, क्या शिकवा करें उनके वार का ।
लगकर मेरे सीने से कहते हैं वो उन्हें इश्क नहीं मुझसे ,
या खुदा क्या जालिम हैं ये अंदाज़ उनके इकरार का ।
रकीबों के इस शहर में सबकी हैं हर किसी से अदावत
कौन सुनेगा 'दास्ताँ' तेरा ये किस्सा पुराना प्यार का ।
Tuesday, September 8, 2009
तुझे मुझसे प्यार न करना हैं, तो न कर
फ़िर नज़रें भी न मिला, यूँ बेकरार भी न कर।
न देख इन मस्त निगाहों से मुझे ,
न हिला, रह रह कर गेसुओं की चिलमन।
दिलफेक नहीं पर आशिक मिजाज है दिल ,
रह-रह कर जुल्फ-ऐ-यार से उलझता है मन।
न छोड़, ठण्डी ठण्डी आहें छिप-छिपकर,
न मुस्कुरा, रह रहकर इन मासूम अदाओं से।
बेपरवाह नहीं, पर कुछ मदहोश है दिल,
रह रहकर बहकता है, हुस्न-ऐ-यार की सदाओं पे।
न थरथरा, रह रहकर होठों से इन हर्फ़ बेमायनों को।
प्यासा नहीं पर, कबका मुन्तज़िर है दिल
रह रहकर मचलता है लब-ऐ-यार के पैमानों को।
फ़िर नज़रें भी न मिला, यूँ बेकरार भी न कर।
Tuesday, August 11, 2009
तेरे बिना एक और दिन, एक और लम्हा
यादों के सिवा कुछ और नहीं, बस तन्हा-तन्हा।
यादों के दो हर्फ़ लिए, आयत सा मैं पढता जाता,
तेरे ही नाम के नुक्ते में,जीवन का हर अर्श मैं पाता
हर पल महसूस किया हैं तुझको अपनी हर बीती धड़कन में,
तेरी यादों के आँचल में ढांपा हैं ख़ुद को जीवन की हर सिहरन में,
तू मुझसे कुछ दूर सही, पर एक रिश्ता तो अब भी मुझसे बांधे हैं तुझको
रोते हम भी सबसे छुप-छुपकर पर तेरी यादों का जज्बा थामे हैं मुझको,
और कहूं क्या तुझसे मैं, अपने टूटे तन्हा दिल का हाल प्रिय,
इन यादों में तुम हो सो जन्नत हैं बाकी सब तो दोज़ख हाल प्रिय,
तेरे जाने का कोई गम मुझको नही -तेरी यादें जो अब आती हैं,
यह तो बस फ़िर मिलने की चाहत हैं जो अब तक तडपाती हैं।
मेरे होने न होने का इतना ही सबब होगा शायद मेरे हमदम !
तू मेरी यादों में हैं अब, मैं तेरी यादों में होऊंगा तब हरदम !
