यह रचना गत माह (टोलेडो) चिडियाघर में एक एकाकी गिद्ध को देखकर उत्पन्न हुई. मन में विचार उठा कि जटायु की मृत्यु का समाचार सुनकर सम्पाति के ह्रदय को क्या अनुभूति हुई होगी और परिणाम स्वरूप इन पंक्तियों ने जन्म लिया
आज बैठा हूँ मैं सम्पाति विवश निराश,
निरीह निहारता नितांत, निरांत-नभ को
सोचता उन क्षण को जब नापा था मैंने,
बस निश्चय से कई परिधियों में इस जग को
तब भी कभी जब यह विस्तृत व्योम मुझे,
अपने कद से थोडा ऊँचा लगने लगता था
अविरल उठता-गिरता उद्दंड दिवाकर अपने मद में,
मेरे शौर्य-पराक्रम पर खुलकर हँसने लगता था
तब मुझको उड़ने को नित्य प्रोत्साहित करते थे,
वे अबाध्य अजेय ओजस्वी अरमान तुम्हारे
वे अबाध्य अजेय ओजस्वी अरमान तुम्हारे
पुनः आओ न इस बिसरे बिखरे जीवनपथ पर ,
फिर से तराशो ये झुलसे खंडित आहात पंख हमारे
शत-योजन दृष्टि का वर-आशीष भी अभिशप्त है
यदि अनय के आगे नतमस्तक गौरव गरुण-रक्त है
प्रत्यक्ष श्वांस में भरकर विष को भी क्या पाया मैंने
सहस्र सर्प-दंश सा जीवन, सब यश व्यर्थ गंवाया मैंने
किसी कन्या के करुण-क्रंदन पर उद्वेलित न ह्रदयांगार हुआ
सुन वेदना के स्वर न धमनियों में ऊष्मा का संचार हुआ
तुझसा सामर्थ्य नहीं था मुझमे कि दस-मुख को ललकार लडूं
ऋषि चंद्रमा* का ऋण ये जीवन पर कैसे इसको धिक्कार धरूँ
मेरे बंधु-क्षय का मूल्य अब दम्भी दशग्रीव दशानन भी चुकायेगा
खग-शापित हो बैरी और बंधु-घात से ही जीवन-च्युत हो जायेगा
जीवन में कुछ क्षण और जीने की प्यास जागते थे वो
निश्छल निष्कपट निर्मल मृदुल अहसास तुम्हारे
पुनः आओ न इस बिसरे बिखरे जीवनपथ पर ,
फिर से तराशो ये झुलसे खंडित आहात पंख हमारे
* चन्द्रमा नामक ऋषि ने ही सूर्य दहन के पश्चात् सम्पाति को नव जीवन दान दिया था
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही| लागी दया देखि करि मोही ||
(किष्किन्धाकांड; रामचरित मानस)
(किष्किन्धाकांड; रामचरित मानस)