प्यारे पथिक
जीवन ने वक्त के साहिल पर कुछ निशान छोडे हैं, यह एक प्रयास हैं उन्हें संजोने का। मुमकिन हैं लम्हे दो लम्हे में सब कुछ धूमिल हो जाए...सागर रुपी काल की लहरे हर हस्ती को मिटा दे। उम्मीद हैं कि तब भी नज़र आयेंगे ये संजोये हुए - जीवन के पदचिन्ह
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Tuesday, July 20, 2010
दिल-तोड़ने से पहले थोडा इंतज़ार कीजिये
यूँ बैठे बैठे न आप, आहें हजार लीजिये
इश्क है गर आपको तो इज़हार कीजिये
करवटों में गुजरेंगे, जागती रातें कितनी
ख्याबों में आकार ही हमे बेक़रार कीजिये
दबाने से नहीं हासिल, इश्क को मंजिल
किसी रोज़ तो दिल का कारोबार कीजिये
मुहब्बत में कहाँ होती, गुंजाइश शिकवों की
हाज़िर है जिगर अपना खुलकर वार कीजिये
जवानी में बहकना भी, होती है इक अदा
किन्ही मामलों में दिल का एतबार कीजिये
मुन्तजिर रहा है 'दास्ताँ', उम्र भर आपका
दिल-तोड़ने से पहले थोडा इंतज़ार कीजिये
Tuesday, October 20, 2009
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ
पर कोई क्या बताए क्यों थी दिलों में दूरियाँ
दिल में रख छोड़ा था एक ख्याब सुनहरा सा
जिनमे हमेशा वो रहा जिसके ख्याबों में मैं ही कहाँ था?
और क्या कहें, क्या रही हमारी मजबूरियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ
उम्र-भर बैठे रहे, जिसकी राहों में हम नज़रें बिछाए
मुझसे मिला वो, तो उसके पास मेरे लिए वक्त ही कहाँ था?
और क्या कहें, क्या रहीं ज़माने भर की मसरूफियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ
मंजिलों की तलाश में हम चले तो सब साथ-साथ थे,
जिसके साथ मैं चला, उसके हाथ में मेरा हाथ ही कहाँ था?
और क्या कहें, क्या रही मेरी बदनाम कहानियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ
हाल-ए-दिल कहने को लिखी जिसके नाम गज़लें तमाम,
उनको सुनने को वो, महफ़िल में तन्हा आया ही कहाँ था?
और क्या कहें, क्या रही उस शाम मेरी खामोशियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ
दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ
पर कोई क्या बताए क्यों थी दिलों में दूरियाँ
Tuesday, October 13, 2009
साँसों में लिपटी पड़ी है मिट्टी, लोग उठाते क्यों नहीं.
इश्क का है फ़साना, सबको खुल कर बताते क्यों नहीं.
दिल पे हैं ज़ख्म कई, ग़ज़ल कोई गुनगुनाते क्यों नहीं
वो कहते हैं कि इश्क में शर्म-औ'-हया हैं पिछले ज़माने की बातें,
हमने तो कह दिया है खुलकर, तुम अब नजरें मिलाते क्यों नहीं
बहुत मजाजी है मिजाज़-ए-यार हमारे दिलबर का,
ख़त लिखते हैं कि हम कब से रूठे हैं, मानते क्यों नहीं
दिल लगाकर दिल मिटाना हैं आदत हुस्नवालों की,
वो आकर मजबूरी-ए-हालात गिनाते क्यों नहीं
वक्त की हवाएं धुंधला देती हैं हर मंजर निगाहों में,
कितने तूफां गुजरे, तेरे ख्याबों को मिटाते क्यों नहीं.
इश्क में जलकर मर मिटना तो हर परवाने का हैं जुनूँ,
कत्ल हुए कितने, लोग शमाँ-ए-बज्म को बुझाते क्यों नहीं
बहुत रुस्वां हुआ हूँ तेरे इश्क की खातिर मैं,
तुम बीती बातों से कुछ पर्दा उठाते क्यों नहीं
देते ही रहते हैं तंज़ के मुबारक तोफहे मुझको,
नाकाम फसानों को ज़मानेवाले भुलाते क्यों नहीं
गम-ए-हिज्र का मय औ' मीना से हैं रिश्ता पुराना ,
कशाने-इश्क पूछे है साकी पर पिलाते क्यों नहीं.
कब का मर गया है दास्ताँ उसके जाने के बाद,
साँसों में लिपटी पड़ी है मिट्टी, लोग उठाते क्यों नहीं.
Wednesday, April 22, 2009
तुझे चाहकर भुला न पाया, ये खता मेरी
तुझे चाहना, न थी भूल मेरी, मेरे हमदम,
तुझे चाहकर भुला न पाया, ये खता मेरी।
अबतक तलाशता हूँ गुमनाम भीड़ में,
तेरा चेहरा इस उम्मीद के साथ।
मिल ही जाए शायद तू मुझे -
किसी मोड़ पर किसी रकीब के साथ।
गर तू मिलकर भी न देखे मेरी ओर,
कोई अफ़सोस न होगा मुझे।
कोई सबब तो मेरे इश्क का ही होगा
जो अब तक रोकता होगा तुझे।
जब फासले हमारे दिलों में हो तो,
जिस्म की दूरियों का क्या गम?
खेल-ऐ-आरजू में कत्ल-ऐ-दिल हकीकत,
ए दोस्त, कभी हम तो कभी तुम।
तुझे चाहना न थी, भूल मेरी, मेरे हमदम,
तुझे चाहकर भुला न पाया, ये खता मेरी।
तुझे चाहकर भुला न पाया, ये सज़ा मेरी।
Thursday, February 26, 2009
दिल बेचारा पगला विरही ठहरा
आंखों ने दुनिया देखी थी -
वो तो कब की थम कर बैठ गयी।
दिल बेचारा पगला विरही ठहरा
अब भी तुझको ढूँढा करता हैं।
वो तो कब की थम कर बैठ गयी।
दिल बेचारा पगला विरही ठहरा
अब भी तुझको ढूँढा करता हैं।
चेहरे पर मुस्कान लपेटे,
चेहरा तो एक छलवा हैं।
हँसी ठिठोली बातें झूठी,
घट ये खुशियों से रीता हैं।
दुनियादारी की रीत अनूठी
सबसे हंसकर मिलना पड़ता हैं।
लाख ज़ख्म लगे हो दामन पर,
खुद ही कतरा कतरा सीना पड़ता हैं।
आंखों ने दुनिया देखी थी -
आधी-पढ़ ख्वाबों की किताब छोड़ दी
दिल बेचारा पगला विरही ठहरा
अब भी पिछले सफे को पढता हैं।
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