प्यारे पथिक

जीवन ने वक्त के साहिल पर कुछ निशान छोडे हैं, यह एक प्रयास हैं उन्हें संजोने का। मुमकिन हैं लम्हे दो लम्हे में सब कुछ धूमिल हो जाए...सागर रुपी काल की लहरे हर हस्ती को मिटा दे। उम्मीद हैं कि तब भी नज़र आयेंगे ये संजोये हुए - जीवन के पदचिन्ह
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Tuesday, June 22, 2010

नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं


नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं
गढ़ लेते हैं स्वप्न जिनका कोई आधार नहीं

एक ख्याल की बंदिश पर कई राग सजाते है,
यूँ ही बैठे बैठे, न जाने किंतने आलाप लगाते हैं
वो सरगम गाते हैं जिसका कोई रचनाकार नहीं 
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...

कैसा भी हो काव्य-भाव बस अनुराग सुझाता है
टूटे-फूटे छंदों पर भी, मन अलंकार सजाता है
वो गीत सुनाते है जिसका कोई गीतकार नहीं
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...

सुख-दुःख के पखवाड़े पर, आशा-दीप जलाते है
बैरी ह्रदय पुष्प पर भी बन प्रीत-भ्रमर मडराते है
सब अपने से लगते हैं, पराया यह संसार नहीं
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...

बहकी बहकी बातों से मन को बहलातें हैं
घंटों बस मौन से न जाने क्या बतियाते हैं
उन प्रश्नों पर ठहरे जिनको उत्तर दरकार नहीं  
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...

Tuesday, September 8, 2009

तुझे मुझसे प्यार न करना हैं, तो न कर



तुझे मुझसे प्यार न करना हैं, तो न कर ,
फ़िर नज़रें भी न मिला, यूँ बेकरार भी न कर।


न देख इन मस्त निगाहों से मुझे ,
हिला, रह रह कर गेसुओं की चिलमन।
दिलफेक नहीं पर आशिक मिजाज है दिल ,
रह-रह कर जुल्फ-ऐ-यार से उलझता है मन।


छोड़, ठण्डी ठण्डी आहें छिप-छिपकर,
मुस्कुरा, रह रहकर इन मासूम अदाओं से।
बेपरवाह नहीं, पर कुछ मदहोश है दिल,
रह रहकर बहकता है, हुस्न-ऐ-यार की सदाओं पे।

न दबा, गुल-ऐ-तब्बसुम यूँ हल्के-हल्के
थरथरा, रह रहकर होठों से इन हर्फ़ बेमायनों को।
प्यासा
नहीं पर, कबका मुन्तज़िर है दिल
रह रहकर मचलता है लब-ऐ-यार के पैमानों को।

तुझे मुझसे प्यार न करना हैं, तो न कर ,
फ़िर नज़रें भी न मिला, यूँ बेकरार भी न कर।

Tuesday, July 28, 2009

तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता


मैंने तो सुना था कि दर्द है बड़ा खुदगर्ज होता,
हर कोई सिर्फ़ अपनी ही किसी बात पर है रोता।
तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता,
वरना मेरे हालत पर, ऐ दोस्त! तेरा चेहरा न भीगा होता ।

तेरी झील सी गहरी आँखों में बसा समुंदर न होता,
यूँ बिना किसी आवाज़, बेबात यह निर्झर न बहता,
तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता,
वरना मेरे जज्बातों पर, ऐ दोस्त! तेरा दिल न पशेमाँ होता ।

दिले-ऐ-कतरनों के सिलने का काश कोई तरीका होता,
पहचाने चेहरों की भीड़ में कोई अपना पाने का सलीका होता,
तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता,
वरना मेरे गम पर, ऐ दोस्त! तेरा न सिसकना होता।

(और अंत में, थोड़ा अलग सा ...)
हर किसी की कहनेवाले को न है कोई सुननेवाला होता,
हंसकर मिलनेवालों का है अक्सर भीगा तकिया होता,
तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता,
वरना सबके के लिए मरने वाला, ऐ दोस्त! न तेरा मेरा मसीहा होता।

Thursday, February 26, 2009

दिल बेचारा पगला विरही ठहरा

आंखों ने दुनिया देखी थी -
वो तो कब की थम कर बैठ गयी।
दिल बेचारा पगला विरही ठहरा
अब भी तुझको ढूँढा करता हैं।

चेहरे पर मुस्कान लपेटे,
चेहरा तो एक छलवा हैं।
हँसी ठिठोली बातें झूठी,
घट ये खुशियों से रीता हैं।

दुनियादारी की रीत अनूठी
सबसे हंसकर मिलना पड़ता हैं।
लाख ज़ख्म लगे हो दामन पर,
खुद ही कतरा कतरा सीना पड़ता हैं।

आंखों ने दुनिया देखी थी -
आधी-पढ़ ख्वाबों की किताब छोड़ दी
दिल बेचारा पगला विरही ठहरा
अब भी पिछले सफे को पढता हैं।

Saturday, February 21, 2009

नयनो की भाषा

तेरी आंखों के दरिया में,
जो दो आंसू पग डाले बैठे थे,
मैं अब तक उनको न पढ़ पाया हूँ।

मैंने तो बस एक प्रश्न किया था,
जीवन की बिखरे पथ पर,
पग-दो-पग मैं भी क्या साथ चलूँ?
श्यामल सी तेरी रातों में,
ढिबरी सा चुप-चाप जलूं...

नयन-नीर के वो दो कण देकर,
तुमने क्या उत्तर दे डाला?
वर्षों बीत गए पर अब भी,
इस संशय में बैठा हूँ-
खुशियों की थी वो नयन वृष्टि
या प्रश्न-वेदना की ज्वाला।
हाय ! नयनों ने क्यों न पढ़ पाई ,
तेरे नयनो की वो भाषा।
उत्तर में तुम एक प्रश्न दे गए,
और उत्तर की एक अभिलाषा।
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