नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं
गढ़ लेते हैं स्वप्न जिनका कोई आधार नहीं
एक ख्याल की बंदिश पर कई राग सजाते है,
यूँ ही बैठे बैठे, न जाने किंतने आलाप लगाते हैं
वो सरगम गाते हैं जिसका कोई रचनाकार नहीं
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...
कैसा भी हो काव्य-भाव बस अनुराग सुझाता है
टूटे-फूटे छंदों पर भी, मन अलंकार सजाता है
वो गीत सुनाते है जिसका कोई गीतकार नहीं
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...
सुख-दुःख के पखवाड़े पर, आशा-दीप जलाते है
बैरी ह्रदय पुष्प पर भी बन प्रीत-भ्रमर मडराते है
सब अपने से लगते हैं, पराया यह संसार नहीं
सब अपने से लगते हैं, पराया यह संसार नहीं
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...
बहकी बहकी बातों से मन को बहलातें हैं
बहकी बहकी बातों से मन को बहलातें हैं
घंटों बस मौन से न जाने क्या बतियाते हैं
उन प्रश्नों पर ठहरे जिनको उत्तर दरकार नहीं
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...