प्यारे पथिक

जीवन ने वक्त के साहिल पर कुछ निशान छोडे हैं, यह एक प्रयास हैं उन्हें संजोने का। मुमकिन हैं लम्हे दो लम्हे में सब कुछ धूमिल हो जाए...सागर रुपी काल की लहरे हर हस्ती को मिटा दे। उम्मीद हैं कि तब भी नज़र आयेंगे ये संजोये हुए - जीवन के पदचिन्ह
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Wednesday, October 27, 2010

कभी तो मिलो मेरे ख्यालातों के मोड़ पर



हुआ अरसा, कभी तो मिलो  
मेरे ख्यालातों के मोड़ पर,
देखूँ, हैं कितना बदला तसब्बुर
जो रखा ख्याबों में जोड़ कर

है इल्म कि कुछ मुश्किल होगी
पर खाली हाथ नहीं आना,
इक्का-दुक्का ही सही -
वो तीखी तकरार छिपा लाना
(क्योंकि) बड़ा विराना हो चला है
तुम्हारे बिन इंतजार का ये आलम
थोडा फीका लगने लगा है  
मुझे, अपना दागदार दामन
यूँ तो चुप्पियाँ भी आकार
अब मुझको सदाएँ नहीं देती
भूले-भटके हुए फिकरों की भी
आहटें सुनाई नहीं देती

मैंने भी,
 रस्म-अदायगी  की खातिर
देने को बासी से उल्हाने  संजोये रखे हैं
तोहफे में कुछ बेमतलब शिकवे शिकायत
बेखुदी में पनपे कुछ ख्यालात
आँखों में पुडियाए रखे है
वैसे तो तुमसे कहने को
मेरे कुछ बेपर्दा हालात भी है
साथ में, जबावों के पते खोजते
कुछ गुमशुदा सवालात भी हैं

तुम मिलना जरूर , चाहे  
हमेशा की तरह कुछ भी न कहना,
अपनी उनीदी उन्मादी आँखों से
बस हर बात पे सवाल उठाते जाना
मेरे वजूद को होने का आसरा मिल जायेगा
और हाँ!! जाते जाते तुम
मेरी यें सर्द सिसकती आहें,
बची खुची सहमी कुचली सी सांसे
सब अपने आँचल में गठिया कर लेती जाना
मुझको जिन्दा रहने का बहाना मिल जायेगा!!

कभी तो मिलो तुम मेरे ख्यालातों के मोड़ पर !!

Wednesday, August 4, 2010

तुम्हारा नाम


बड़े छोटे से लगे दर्द अपने
जब चंद पन्नो पर
सिमट आये
कविता बनकर....

तेरी लटों में उलझे
वो तन्हा से ख्यालात,
तेरे बोसों से महके,
कुछ गुमनाम दिन-रात
कुछ कहे-अनकहे  से
मेरे दर्द और  जज्बात
वो सालों तक सताती रही
तेरी रुखसत की एक बात
वो मेरी उम्रदराज आरजू,
एक कशमकश, इंतजार
सब कुछ !!
बस चंद पन्नों पर
सिमट आया था

फिर एक नज़र में,
अपनी कविता लगने लगी..
ज़िन्दगी से बड़ी
आखिर कुछ अल्फाजों में सही 
किसी शख्स की थी उम्र पड़ी
कुछ आशाएं, कुछ निराशाएं
दिल की बोली कुछ नैन-भाषाएँ
कुछ पाने की चाह,
कुछ खोने की आह

अल्फाजों औ' सफों के दायरों से अलग
भावों औ' ज़ज्बातों से ऊपर
तेरे-मेरी कहानी के बंधन से अलग
इक जुस्तजू, इक धरोहर की
खुशबू की तरह रोशन
साँस लेती, जीती मरती इक कहानी
जो पनप रही थी
उन चंद पन्नों पर....

पर दोनों ही हालातों में ,
शिकवा तो वही था, जानम!
इस बेनाम साझी सी कहानी की
हर लाइनों की तहों में,
जबकि एहसास सिर्फ तुम्हारा  था
लेकिन मेरी हाथ की रेखाओं की तरह
इस नज्म  में भी नदारत,
 नाम तुम्हारा था...

Tuesday, June 29, 2010

मुक्ति-कामना



प्रिय तुम!!
मुक्त कर दो मुझे,
प्राण परिधियों से...
दिग्भ्रमित करती अविरत 
जीवन मोहनियों* से 

मैं प्रज्वलित निष्प्रदीप
व्यर्थ होता जीवन-यज्ञ
विचलित मन-खग
स्थिल हो रुकते पग
प्रीत कर पिंजर से
मुष्ठियों में ढूंढता नभ

श्वास क्षितिज के पार
जहाँ बिंदु भर लगता
व्योम-विस्तार
काल-खण्डों की -
कल्प-गणना से विरक्त
अनन्त से अनन्त तक
दृष्टव्य जहाँ उन्मुक्त सत्य
शुभ्र, सनातन किन्तु अव्यक्त

लेकर वही उसका पथ-प्रखर
हे कमनीय! बन कुंदन
शाश्वत जाऊँ मैं निखर
प्रिय तुम!!
मुक्त कर दो मुझे,
प्राण परिधियों से...


* जीवन मोहिनियों  = पंच-विकार; काम, क्रोध, लोभ मोह और अहंकार

Tuesday, June 22, 2010

नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं


नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं
गढ़ लेते हैं स्वप्न जिनका कोई आधार नहीं

एक ख्याल की बंदिश पर कई राग सजाते है,
यूँ ही बैठे बैठे, न जाने किंतने आलाप लगाते हैं
वो सरगम गाते हैं जिसका कोई रचनाकार नहीं 
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...

कैसा भी हो काव्य-भाव बस अनुराग सुझाता है
टूटे-फूटे छंदों पर भी, मन अलंकार सजाता है
वो गीत सुनाते है जिसका कोई गीतकार नहीं
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...

सुख-दुःख के पखवाड़े पर, आशा-दीप जलाते है
बैरी ह्रदय पुष्प पर भी बन प्रीत-भ्रमर मडराते है
सब अपने से लगते हैं, पराया यह संसार नहीं
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...

बहकी बहकी बातों से मन को बहलातें हैं
घंटों बस मौन से न जाने क्या बतियाते हैं
उन प्रश्नों पर ठहरे जिनको उत्तर दरकार नहीं  
नयनो से बड़ा होता कोई शिल्पकार नहीं...

Tuesday, June 8, 2010

केहि बिधि मिट्टी से मिट्टी मिल जावे...

मित्रों,

ऐसे ही फुर्सत के कुछ लम्हों में एक ताल के किनारे बैठे हुए, मेरोरियल डे के दिन (मई ५, २०१०) चंद पंक्तियाँ मन में उपजी...उन्हें सूफियाना रंग और विस्तार  देकर प्रस्तुत कर रहा हूँ,  वैसे तो सूफी गीतों पर मेरी कोई पकड़ नहीं हैं पर फिर भी विश्वास है कि आप मेरी इस कोशिश को सदैव की भांति अपना स्नेह देंगे.
सादर,
सुधीर


कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे
दाग देय देंह को कोई, या मिट्टी में मिट्टी दबवाबे
पिया-मिलन की आस है, बाबुल के रिश्ते  बिसरावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

सुलगी जब नयनन की बाती, दहकी सांसों से छाती
बहुत जली पीहर मैं तो, विरह की तपन में मैं तो
कोई तो पिय को बतलावे, लेप-चंदन से मिट न पावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

पीहर के खेल-तमाशे, कुछ बाँधे कुछ समझ न आवे
पिय ने बिसरा मोको पर जियरा पिय को न बिसरावे
इक नेह की डोर से बँधे हैं कैसे कोई बंधन छुटबावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

जग की है रीति पुरानी, पीहर का कितना दाना पानी
पग-फेरे की बात थी अपनी, निठुर की देखो मनमानी
कैसे भूले वो प्रेम-कहानी, कोई तो उनको याद करावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे
दाग देय देंह को कोई, या मिट्टी में मिट्टी दबवाबे
पिया-मिलन की आस है, बाबुल के रिश्ते बिसरावे
कहे सुधीर केहि बिधि, मिट्टी से मिट्टी मिल जावे

Tuesday, May 25, 2010

मृत्यु से अनुरोध


शरणाकांक्षी अंतर्मन
आहात देह
खंडित दीप
च्युत नेह

रह रहकर
गिरता मन
ज्योति दण्डित
तम सघन

नयन स्थिल
मेधा विकल
प्रतीक्षारत विभा
रवि विह्वल

आलंबनाकांक्षा
अलिंगनानुरोध
श्वांस समर्पण
जीवन प्रतिरोध

पाप-पुण्य से दूर
स्वर्ग-नर्क से इतर
हो साथ तेरा
वही मार्ग प्रखर

हो स्पर्श तेरा
पावन-पुनीत
भाव पराजय का
हो शुन्य प्रतीत

तुम जयी बन
ले जाओ मुझसे
मेरे झूठे अहम्
जो निर्वासित जग से

Saturday, May 22, 2010

सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं


सुलग कर रह गया चाँद फलक पर,
अंधियारी रातों में शोखियाँ चलती नहीं
मांग लेता खुदा से मैं भी तुझको पर,
सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं

क्या करता मैं नुमाइश इन ज़ख्मों की
मुर्दा-दिलों में टीस कोई उठती नहीं
दौड़ना रही मजबूरी मेरी उम्र भर
गिरे देवों के लिए भी भीड़ रूकती नहीं

हमदर्द तलाशता क्या इस शहर में
गैर के फ़सानों पर कोई रोता नहीं
तन्हाइयों से रहा खुद बतियाता मैं
दर्दीले नगमों पर कोई वक्त गँवाता नहीं

थी उम्मीद मुझे एक और मुलाकात की
सोची बातें हज़ार पर कहना आसाँ नहीं
हैं ज़ख्म इतने हैं अपने चाक जिगर पर
गैरों को दिखाना अब मुझे गंवारा नहीं

बहती रहीं आँखों से, चाह मिटती नहीं
क्यों कोशिशें तुझे भूलने की चलती नहीं
 मांग लेता खुदा से मैं भी तुझको पर,
सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं

Saturday, April 24, 2010

कुछ कथाओं की अपूर्णता ही देती हैं तृप्ति ...



कुछ कथाओं की अपूर्णता ही देती हैं तृप्ति ...
कौन जाने अन्यथा जीवन-पूर्णता भी क्या मुक्ति?

स्वयं तराशता परिधियाँ अपनी  कामनाओं की
उकेरता अदृश्य-खंडित सीमायें भावनाओं की
हैं तो असंख्य आकांक्षाएं सहज समाधान की
किन्तु दृष्टव्य नहीं कोई राह मुक्त-व्यवधान की

प्रस्तुत विविध विकल्प अनन्त वैभव विस्तार के
तोल-मोल भाव लग रहे हैं भावों के संसार के
विक्रयशील मनुज, मार्ग कई हैं आत्म-व्यापार के
उऋण न देह यहाँ, तो पथ क्या हों प्राण-प्रसार के

अदृश्य जीवन-मंथन अनवरत चल रहा प्रारब्ध से  
उपजता मात्र हलाहल, विलुप्त रत्न सभी  प्रसाद से
वरण करता रहा, क्या अपेक्षित करूँ शिवाराध्य से
मोक्ष-तृष्णा से मरूं या तृप्त प्रयाण  हो प्रमाद से

कौन जाने अन्यथा जीवन-पूर्णता भी क्या मुक्ति?
कुछ कथाओं की अपूर्णता ही देती हैं तृप्ति ......

Wednesday, March 31, 2010

गुमनाम सी मौत


कल जो मरा गली के नुक्कड़ पर,
गुमनाम सी मौत,
वो शायर ही होगा शायद....

ताउम्र अहसासों की कुची से
रंग भरता रहा जिंदगी के,
शफाक से कागजों पर...
रंग ही न बचे उसकी -
ज़िन्दगी के मुहाने पर 
कितनी सादगी से मौत ने  भी
 थामा उसका बदरंग सा दामन...
वो शायर ही होगा शायद....

लब्जों की चिलमन से
कई बार झाँका था उसने
दिलकश-हसीं जिंदगी का चेहरा
पर शब्द भी तो इंसान के जाये थे
कब तक साथ निभाते?
एक उफ़ भी न कह सका वो 
थामा जब मौत ने चुपके से उसका दामन ...
वो शायर ही होगा शायद....

सबके दर्द की चुभन,
कुछ आंसू, एक टीस
महसूस करता रहा ज़िन्दगी भर...
गढ़ता रहा नज़्म का चेहरा
भरता रहा बज़्म में दर्द के प्याले
पर एक हमदर्द भी न मुनस्सर हुआ
थामा जब मौत ने उसका तन्हा दामन
वो शायर ही होगा शायद....

कल जो मरा गली के नुक्कड़ पर,
गुमनाम सी मौत,
वो शायर ही होगा
 यकीनन!!

Tuesday, February 23, 2010

क्या कहता वो, बस रो पड़ा मेरा नाम लेकर



पूछा जो हाल-ए-दिल, साकी ने  दो जाम देकर
क्या कहता वो, बस रो पड़ा मेरा नाम लेकर

गम-ए-हिजरा में होती हैं ऐसी भी हैं अदाएं,
बतियाते हैं वो, आईने से मेरा नाम लेकर

हालात का मारा है शायद, होगा खौफज़दा भी,
सुनाता है वो, फ़साना अपना मेरा नाम लेकर

गर्दिश में बदलती हैं, तहजीबो-अदब की निगाहे,
बुलाते हैं वो, न अब मुझको मेरा नाम लेकर

हमशक्ल न सही, हममिजाज़ तो होगा वो शख्स
भुलाते हैं वो, जिसे दास्ताँ मेरा नाम लेकर

Tuesday, February 2, 2010

अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित,

मित्रों,
कल अपने जन्मदिन पर कुछ क्षण ऐसे भी आये, जब चहुँ ओर की उल्लास और शोर शराबे के बीच मैं आत्म मनन में जुट गया - जीवन के बारे में सोचने लगा. (शायद बढती उम्र का असर होगा!!) . उन्ही विचारों को कविता का रूप देकर आपसे साँझाकर रहा हूँ. आशा है कि आप मेरी इस आत्म-चिंतन को परोसने की धृष्टता को अपना प्रेम देकर क्षमा करेंगे.
सादर,
सुधीर




अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित,
या जीवन-लालसा में व्यर्थ श्वांस-घट रिक्त ...

दो-राहों से पटे समर में, कब संशय-मुक्त
जो पथ पकड़ा क्या वही सहज उपयुक्त
न नाप सका जिन पगडंडियों की लचक
क्यों उनकी कमनीय कामनाओं से व्यथित?
अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित.... 

अधजल गागर का हैं यह थोथा स्वर,
या शुन्यता देती चुनौती मुझको प्रखर
मोक्ष मेरा क्या ज्ञान-सिन्धु आप्लावित
मुक्ति-मार्ग होगा श्रम-साध्य स्वेद लिप्त
अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित....

मखमली स्वप्निल संभावनाओं से सुसज्जित
इच्छाओं आकांक्षाओं की अट्टालिकाओं से सृजित
क्या होगा मेरा स्वर्णिम भावी-भविष्य परिलक्षित
या कपोल-कल्पित तृष्णामयी होगा जीवन व्यतीत
 अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित....

काल के कपाल पर रहूँगा एक अरुणिम तिलक,
यश कीर्ति की रश्मिया लेकर फहरेगा मेरा ध्वज
या कौन जाने? मरू में अंकित एक रेखा की तरह
क्षण भर में ही हो जाये मेरा अस्तित्व विलुप्त
अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित....

अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित,
या जीवन-लालसा में व्यर्थ श्वांस-घट रिक्त ...

Tuesday, January 19, 2010

यह मध्यम-मध्यम चढ़ती जीवन बेला है

मित्रों,
शांतनु ने  जब प्रातः काल भ्रमण में रूपसी  गंगा का ऐश्वर्य प्रथम बार देखा होगा तो उनके मन में क्या विचार उत्पन्न हुए होंगे...इसी कल्पना को लेकर कुछ पंक्तिया लिखी हैं. आशा है कि आपका प्रेम मिलेगा...



यह मध्यम-मध्यम चढ़ती जीवन बेला है,
उस पर देखो कैसा कुसुम मृदुल सवेरा है

यौवन सुरभि मद-मस्त पवन को छलती है
अरुण-कपोलों की लाली गगन में घुलती है
अधर-कम्पन पर भ्रमित भ्रमर-दल गुनगुनाते हैं
देख अलक की रंगत श्यामल मेघ-घन लजाते हैं
प्रातः का है स्वप्न या साकार मैंने तुझको देखा है
यह मध्यम-मध्यम चढ़ती जीवन बेला है,

कनक किरण की कांति लिए यह कंचन-काया है,
मदन-मोहती मादक क्या मृगतृष्णामयी  माया है
होकर परास्त पद-गिरे पराक्रम  ऐसी पद्मा-छाया है
सहस्र नृप करें सामर्थ्य समर्पण ऐसी सुदर्शन-आभा है
बहक रहा मैं मधु-पीकर या प्रीत-पाश तुमने फेंका है
यह मध्यम-मध्यम चढ़ती जीवन बेला है

मोक्ष-कामना भ्रमित हुई और तप कितने खंडित
आत्म-ग्लानि में प्रज्वलित कितने तापस पण्डित
विस्मृत विद्या-विज्ञान सभी, छवि तेरी ही अंकित
दो कण यौवन मदिरा के पी क्यों  न मैं हूँ दण्डित
निष्फल निष्काम मृत्यु या तुझ संग जीने का फेरा है
यह मध्यम-मध्यम चढ़ती जीवन बेला है

यह मध्यम-मध्यम चढ़ती जीवन बेला है,
उस पर देखो कैसा कुसुम मृदुल सवेरा है

Tuesday, January 12, 2010

बचना वो हँसकर मिलता है दोनों बाहें फैलाएं




बचना वो हँसकर मिलता है दोनों बाहें फैलाएं
मुश्किल में होगा न जाने कौन सा काम बताए

चुनावी मौसम था, वादों की बयार में गुजर गया
आओ अब खुद सुलझाएं अपनी अपनी समस्याएँ 

रही बाट जोहती शिक्षक की किनती सारी कक्षाएँ
ट्युशन से पार लगेंगी इस साल की भी परीक्षाएं

सच ही होगी खबर दंगों की आज के अखबार में
सरकार ने कहा सब विपक्ष ने हैं फैलाई अफवाहें

दाल-रोटी महंगी हुई पर जीने की और विवशताएँ
घी-लकड़ी के दाम हैं दुने बड़ी महंगी पड़ेगी चिताएँ

न कर उम्मीद दास्ताँ किसी भी पीर औ' मुर्शिद की
बदलनी किस्मत हैं तुझको तो खुद गढ़ अपनी राहें

Tuesday, December 29, 2009

'एक्सक्लूसिव' खबर





कल भूख से मर गए कुछ गरीब बच्चे मेरे शहर में
यह हृदय-विदारक खबर जब किसी चैनल पर न आई
इक नए युवा पत्रकार के दिल की धड़कन घबराई
होकर परेशान उसने यह बात अपने संपादक से उठाई

संपादक ने कहा - बड़े नौसिखिया हो यार !
किसने बना दिया हैं तुमको आज का पत्रकार?
जो मरे वो तो बच्चे थे, बस  भूखे  लाचार
इसमें इन्वोल्व  न कोई नेता, भाई या तडीपार

खबर मैं  छाप दूं अभी पर इससे चैनल क्या पायेगा
यह मुद्दा मुश्किल  से दस सेकंड भी न चल पायेगा
कुछ दिन पड़े रहने दो लाशें, मुनिसिपल इश्यु हो जायेगा
तब यही खबर अपना चैनल एक्सक्लूसिव ले आएगा

चिंता न करो, तुम्हारा रिसर्च बेकार नहीं जायेगा
जब खबर लायेंगे तो ये ग्राउंडवर्क  काम आयेगा
भूलना मत, दो चार फोटो आज की भी  लेते आना
 मुश्किल होता हैं वरना एक्सक्लूसिव खबर का बैकग्राउंड बनाना

पहले बेचारा पत्रकार चकराया
और फिर  अपनी चिंता जतायी,
मान्यवर अगर नगरपालिका वालों ने
उन बच्चों की  लाशें आज ही हटाई

संपादक खिलखिलाया और फिर हल्के से फुसफुसाया
नौसिखिये हो इसलिए तुमने यह मुद्दा उठाया
चुपचाप गायब होती लाशों का मसला और बिक जायेगा
साजिश का एंगल  तो चैनल की टीआरपी बढाएगा

Tuesday, December 15, 2009

माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा




माँगा खुदा से अब  न हो रहबर ज़माना मेरा |
बस हुआ संगदिल रहनुमाओं से दिल आजमाना मेरा ||

अपनी अपनी दूकान पर यहाँ सबके अपने रसूल,
बिकते मजहब,  बिकती मुहब्बत और बिकते उसूल
अश्कों को कीमत, हर अहसास को तिजारत कबूल
यूँ ही अपने वजूद के तोल-मोल  भाव तलाशना  मेरा

बस हुआ ठगते  रहनुमाओं का दाम लगाना मेरा
माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा



झूठ की सियासत में, हमेशा सच बदलते लोग
झूठे वादे, झूठी कसमे, झूठी रस्मे निभाते लोग,
झूठे फलक के नीचे ऐतबार के कच्चे-घर बनाते लोग
ऐसी ख्याली दुनिया में इक सब्जबाग तलाशना  मेरा

बस हुआ झूठे  रहनुमाओं का दिल बहलाना मेरा
माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा



फरेब से बचने को फरेब के जाल बिछाती दुनिया
कुछ ऊँचा उठने को सबके सर चढ़ जाती दुनिया
मतलब से नए खुदाओं के सजदे में सर झुकाती दुनिया
ऐसे में अपनी खुदगर्ज अजानों के नए  मायने तलाशना मेरा

बस हुआ फरेबी रहनुमाओं पे भरोसा जाताना मेरा
माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा



मंजिले खोकर भूले रास्ते को घर बनाते बन्दे
हक-ए-आरजू में फर्ज पर मिट्टी गिराते बन्दे
भुलाके दीन-ओ-ईमान, रहमत के कसीदे रटाते बन्दे
ऐसे भूले-बिसरे अरमानों में गुमशुदा ज़मीर तलाशना मेरा

बस हुआ  भटके रहनुमाओं को सरपरस्त बनाना मेरा
माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा


माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा
बस हुआ संगदिल रहनुमाओं से दिल आजमाना मेरा

Tuesday, December 8, 2009

हुआ इश्क में रुस्वां, इक नई पहचान ढूंढता हूँ



मुसाफिर हूँ यारों, इक शहर अनजान ढूंढता हूँ
हुआ इश्क में रुस्वां,  इक नई पहचान ढूंढता हूँ

मजहब के वादों पर मरते  रोज़ इंसान देखता  हूँ
बता दे जो खुदा को मेरा दर्द,  वो अजान ढूंढता हूँ

दहशत में जीता है, बनकर तमाशाई मेरा  शहर
फूँक दे जो मुर्दा दिलों में जान, वो इंसान ढूंढता हूँ

सरहदों के नाम पर, बाँट ली है यह ज़मी सबने,
पनाह दे जो हर किसी को, वो आसमान ढूंढता हूँ

तंग-हाल जीकर भी, क्या पाया  है सुकून किसी ने
बेच के उसूल, इस दौर में रास्ता आसान  ढूंढता हूँ

दुश्वार है बेखौफ, कुछ सुनना-सुनाना इस जहाँ में
जहाँ हो गुफ्तुगू खुद से, वो इलाका वीरान ढूंढता हूँ

असर कुछ तो हैं उसकी जफा का  'दास्ताँ' तुझपर,
देख के वो नज़रें फिराता है औ' मैं अहसान  ढूंढता हूँ

Tuesday, November 24, 2009

हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!




हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

 जब एक कट-चाय समोसे से,
हम यह दुनिया नापा करते थे,
एक ख्याली धागे के दम पर,
हम  हर सिस्टम बांधा करते थे
यूँ तो हर बात फलसफे पर होती थी
एक हम ही ज्ञानी-विज्ञानी थे  बस्ती  के
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के  !!

हर जटिल विषय की कक्षाएँ
केवल  जीकेडी पर लगती थी
सत्तर प्रतिशत अटेनडेंस पाने को
सिर्फ प्रॉक्सी की कौडी चलती थी
यूँ तो (असाइनमेंट) टोपिंग में हम शातिर थे  पर
कुछ कर जाते थे श्रमदान जूनियर्स जबरजस्ती से
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

वैसे तो एक ख्वायिश की उलझन में
अक्सर कितनी राते जागा करते थे,
पर हर रात परीक्षा से पहले हम,
हर दिन पढने की कसमे खाया करते थे
यूँ तो एक साल में पढना मुश्किल था पर
कई पोथी घिस जाते थे एक रात में चुस्ती से
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

एक अदद पिक्चर की खातिर हम,
हॉस्टल में सबसे चिल्लर  माँगा करते थे
मुफलिसी के दौर  रहे तो सब मिलकर
कपूरथला गंजिंग की गलियां नापा करते थे
यूँ तो एक मैगी  से  दस-दस खाया  करते थे
उधार चुकाने को दिखला देते थे दांत बत्तीसी  के
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

हर अखबारी कतरन पर जमकर ,
हम सबके रिश्ते छाना करते थे,
सबकी प्रेम-कहानी पर हँसते हम पर
'उससे' मिलकर बगले झाँका करते थे
यूँ तो हर बात खनक से होती थी
पर क्या समझाते उसको कारण चुप्पी के
हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

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यह कविता अचानक फेसबुक पर एक लंगोटिया यार के मिल जाने पर मन से निकली आह से उत्पन्न हुई है. उससे बात करते करते कॉलेज के पुराने दिन याद आ गए. जब परीक्षा से एक रात पहले पाता चलता था कि एक पूरी कि पूरी किताब कोर्स में हैं जिसका हमे पाता ही नहीं था ...हर जटिल विषय की क्लास से हम ऐसे गायब रहते थे जैसे कि गधे के सर से सींग... सत्तर प्रतिशत उपस्थिति दर्ज हुई नहीं कि उस क्लास से हमारा डब्बा गोल, उसके बाद तो हम केवल ढाबों पर चाय की चुस्की का आनंद लेते मिलते थे. सांख्यिकी से ज्यादा मेंहनत पिया-मिलन वाले जोडों की गणना में करते थे. उस समय हम समाज और संसार के हर विषय पर बहस करने का माद्दा रखते थे और संसार की समस्त समस्याओं का समाधान तो हम बैठे बैठे चुटकियों में निकाल लेते थे. बस ढाबे की एक सांझी चाय और समोसे का भोग लगता रहे (चाहे उधारी पर ही क्यों न ) तो सामायिक विषयों से लेकर लोकल प्रेम प्रसंगों पर हमारी ज्ञान ग्रंथि खुली रहती थी. क्योंकि यह रचना दिल की अभिव्यक्ति है इसलिए मैंने कई परचित देशज (और विदेशज) शब्दों को भी नहीं बदला है. कुछ अप्रचिलित शब्दों की परिभाषा निम्न  है.

  •  जीकेडी: गुप्ता का ढाबा. लखनऊ आई.ई. टी (इन्जिनेरिंग कॉलेज) के साथ में चलने वाला ढाबा. हमारे छात्र-जीवन में सारे के सारे ढाबों का विलायतीकरण उनके नामों के संक्षिप्त करके ही किया गया था जैसे मिश्रा का ढाबा यमकेडी, गुप्ता का ढाबा जीकेडी. इस ढाबों ने जितने सपनों को बनते बिगड़ते देखा हैं शायद ही आस-पास को कोई ईलाका उसकी बराबरी कर पाए - चाहे वो नौकरी या छोकरी के सपने हो या पनपती छात्र-राजनीति की महत्वाकांक्षाएं.


  • टोपिंग: प्रोजेक्ट या असाइनमेंट की नक़ल (टोपने अथवा टीपने) की कला; जो अक्सर एक घिस्सू छात्र के समाधान निकालने के बाद अक्सर स्वयं या जूनियर्स द्वारा कक्षा के अन्य  उन्मुक्क्त विचारों वाले छात्रों के लिए प्रतिलिपि बनाने की कला के लिए प्रयुक्त होता है.

  • गंजिंग = लखनऊ के प्रगतिशील हजरतगंज के इलाके में जीवन के फलसफे और रंगीनियों को तलाशते हुए हम जैसे फक्कडों का घूमना

Tuesday, November 17, 2009

सम्पाति-प्रलाप



यह रचना गत माह (टोलेडो) चिडियाघर में एक एकाकी गिद्ध को देखकर उत्पन्न हुई. मन में विचार उठा कि जटायु की मृत्यु का समाचार सुनकर सम्पाति के ह्रदय को क्या अनुभूति हुई होगी और परिणाम स्वरूप इन पंक्तियों   ने  जन्म  लिया

आज बैठा हूँ मैं सम्पाति विवश निराश,
निरीह निहारता नितांत, निरांत-नभ  को
सोचता उन  क्षण को जब नापा था मैंने,
बस निश्चय से  कई परिधियों में इस जग को
तब भी कभी जब यह विस्तृत व्योम  मुझे,
अपने कद से थोडा ऊँचा  लगने लगता था
अविरल उठता-गिरता उद्दंड दिवाकर अपने मद में,
 मेरे शौर्य-पराक्रम  पर खुलकर हँसने लगता  था
तब मुझको उड़ने को नित्य प्रोत्साहित करते थे,
वे अबाध्य  अजेय ओजस्वी अरमान तुम्हारे
पुनः  आओ न इस बिसरे बिखरे जीवनपथ पर ,
फिर से तराशो ये झुलसे खंडित आहात पंख हमारे


शत-योजन दृष्टि का वर-आशीष भी अभिशप्त है
यदि अनय के आगे नतमस्तक गौरव गरुण-रक्त है
प्रत्यक्ष श्वांस में भरकर विष को भी क्या पाया मैंने
सहस्र सर्प-दंश सा जीवन, सब यश व्यर्थ गंवाया मैंने
किसी कन्या के करुण-क्रंदन पर उद्वेलित न ह्रदयांगार हुआ
सुन वेदना के स्वर न धमनियों में ऊष्मा का संचार हुआ
तुझसा सामर्थ्य नहीं था मुझमे कि दस-मुख को ललकार लडूं
ऋषि चंद्रमा* का ऋण ये जीवन पर कैसे इसको धिक्कार धरूँ
मेरे बंधु-क्षय का मूल्य अब दम्भी दशग्रीव दशानन भी चुकायेगा
खग-शापित हो बैरी और बंधु-घात से ही जीवन-च्युत हो जायेगा
जीवन में कुछ क्षण और  जीने की प्यास जागते थे वो
निश्छल निष्कपट निर्मल मृदुल अहसास तुम्हारे
पुनः आओ न इस बिसरे बिखरे जीवनपथ पर ,
फिर से तराशो ये झुलसे खंडित आहात पंख हमारे


* चन्द्रमा नामक ऋषि ने ही सूर्य दहन के पश्चात् सम्पाति को नव जीवन दान दिया था
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही|  लागी दया देखि करि मोही || 
(किष्किन्धाकांड; रामचरित मानस)

Tuesday, November 10, 2009

सुना है उनकी तस्वीर ईनाम पाने को है



रोते बच्चे जो, मोहताज़ दाने-दाने को है
सुना है उनकी तस्वीर ईनाम पाने को है

फिर मुस्कुराती है, हर इक बात पर वो,
आँखों में उसकी सावन छाने को है.

सहमने लगा हैं यह शहर शाम ही से,
लगता है कोई त्योहार आने को है

बदलने लगे हैं, बात बात-ही-बात में वो,
दिल-ए-नादाँ तू धोखा खाने को है

तुझसे ही हैं, बावस्ता सारे गम मेरे यूँ तो
ज़माने की खुशियाँ वर्ना लुटाने को है

मिलने लगे हैं हंसकर सब दोस्त मुझसे,
खंजर कोई दिल आजमाने को है

मौत की राह है, देखता 'दास्ताँ' तू क्यूं
बहाने कम क्या जान जाने को हैं

Tuesday, November 3, 2009

काश! हम भी एक मौसमी दरख्त हो पाते




मौसम की करवट पर, 
हवाओं की छम-छम पाजेब पर,
आशिक़ मिजाज पेडों को
जब रंग बदलते देखता हूँ
तो सोचता हूँ क्या यही प्यार है,
इश्क का इज़हार है

एक मौसम का साथ,
चंद दोपहरियों का ताप
जिनमे साथ कुछ धुप सही, कुछ छाया
हवाओं से फिर न जाने क्या रिश्ता बनाया
कि उनकी सर्द होते स्पर्श के स्पंदन से
पाकर एक अनुभूति अपने अंतर्मन में
कुछ यूँ पसर जाते हैं,
अपने पतझड़ के दर्द को भुलाकर भी,
यार के लिए रंगीन नज़र आते हैं ....
मौत के आगन में, दर्द  के दामन में 
दीदार-ए-यार से गुल सा खिल जाते है

(और एक हम हैं कि )
एक मौसम नहीं सौ ऋतुयें देखी हैं,
एक छत जो  ईंट-ईंट जोड़ी है
उसके नीचे एक रिश्ता भी न रच पाते है
तेरे मेरे शब्दों में  खुद अपनों से कट जाते हैं
अपने अपने गम का पत्थर लेकर
मुकम्मल रिश्तों को भी चुनवाते हैं 
अपनी गुरूर की मैली चादर
झूठी खुशियों  की  खातिर इतना फैलाते हैं
सिर्फ गम के ज़ार-ज़ार पैबंद नज़र आते है

काश! हम भी एक मौसमी दरख्त हो पाते
सांसों की शाख छोड़ने से पहले
एक बार ही सही ,
यार के लिए यूँ ही मुस्कुराते,
जाते जाते उसका दामन रंगों से भर जाते !!
काश! हम भी एक मौसमी दरख्त हो पाते !!
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