प्यारे पथिक

जीवन ने वक्त के साहिल पर कुछ निशान छोडे हैं, यह एक प्रयास हैं उन्हें संजोने का। मुमकिन हैं लम्हे दो लम्हे में सब कुछ धूमिल हो जाए...सागर रुपी काल की लहरे हर हस्ती को मिटा दे। उम्मीद हैं कि तब भी नज़र आयेंगे ये संजोये हुए - जीवन के पदचिन्ह
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Saturday, July 10, 2010

तुम

मित्रों,
आज अपने विवाह की १०वी वर्षगांठ पर अपनी प्राण-प्रिया के लिए चंद पंक्तियाँ लिख रहा हूँ...मेरी हिंदी की डाक्टर साहिबा पत्नी को हो सकता है यें कविता काव्य-शास्त्रों के मापदंडों पर खरी न उतरती हुई प्रतीत हो... पर मैं इस सार्वजानिक मंच से बस इतना ही कहना चाहिंगा - यदि भावों की अभिव्यक्ति कविता है, यदि ह्रदय की टीस कविता हैं, यदि अव्यक्त अभिलाषाओं की बातें कविता हैं, तो प्रिय, फिर ये मेरे ह्रदय-उदगार भी कविता हैं....



तुम! तुम ही क्यों वो,
जो मेरे अंतः का हर स्पंदन,
बोली या सहमी हर धड़कन
ह्रदय की हर परिभाषा -
आशा या निराशा
यूँ खुली किताब सा पढ़ लेते हो
और वो सब, निःशब्द
बिना अलंकार, सज्जा-श्रृंगार
बिना किसी मिथक
हर भाव पृथक-पृथक
नैनों से कह देते हो

मुठ्ठी भर मुस्कान
कुछ आंसू जाने अनजान
कुछ सच्चाई  कुछ कडुवाहट
बिना शोर बिना शिकायत
सब कुछ!! बिना राग
जीवन  के भारी काव्य 
मेरे काँधों  पर सर रख
सांसों में गा लेते हो....

सुख-दुःख की बन्दर-बाट
पाप-पुण्य की बिछी बिसात
स्वप्नलोक के टूटे घट
अभिलाषाओं के प्यासे पनघट
सब भूला-
पीयुष घटा की प्रथम  फुहार  बन
आलिंगन में कस लेते हो...

तुम! तुम ही क्यों वो,
जो मेरे अंतः का हर स्पंदन,
बोली या सहमी हर धड़कन
यूँ खुली किताब सा पढ़ लेते हो

Tuesday, May 25, 2010

मृत्यु से अनुरोध


शरणाकांक्षी अंतर्मन
आहात देह
खंडित दीप
च्युत नेह

रह रहकर
गिरता मन
ज्योति दण्डित
तम सघन

नयन स्थिल
मेधा विकल
प्रतीक्षारत विभा
रवि विह्वल

आलंबनाकांक्षा
अलिंगनानुरोध
श्वांस समर्पण
जीवन प्रतिरोध

पाप-पुण्य से दूर
स्वर्ग-नर्क से इतर
हो साथ तेरा
वही मार्ग प्रखर

हो स्पर्श तेरा
पावन-पुनीत
भाव पराजय का
हो शुन्य प्रतीत

तुम जयी बन
ले जाओ मुझसे
मेरे झूठे अहम्
जो निर्वासित जग से

Tuesday, January 26, 2010

बीता हुआ कल...




बीता हुआ कल, मिल जाये कहीं, किसी मोड़ पर
बढ़ जाना तुम हँसकर, सिसकता उसे छोड़कर


न सुनना उसकी कोई दिलकश कहानी
न बहाना आँखों से दो बूँद पानी ...
कसकर थामना तुम अपने दामन को
बिफर कर न पकड़ ले वो पागल-
तुम्हारे अरमानों के  आँचल को 


न ठहरना पलभर, न देखना दम भर
नज़रें झुकाकर चुपचाप निकल जाना
पूछें जो कोई तो तुम कर लेना बहाना 
बचकर  कर चलना, उस मोड़ पर - 
कहीं थाम न ले कदम तुम्हारे,
कोई सिसकी, वहाँ दम तोड़कर


संभलना, यहाँ राख में आग भी है!
रिश्तों में अभी बाकी साँस भी है!
कोई बेपर्दा आह तुम्हारी,
हवा का काम न कर दे
बीते किस्से कहीं आम न कर दे


रोकना सिसकियाँ उस मोड़ पर,
बढ़ जाना हँसकर, सिसकता उसे छोड़कर.....

Tuesday, August 25, 2009

एक निर्वस्त्र दर्द


एक जागती रात के सिरहाने बैठकर,
आकाश की काली आँखों में झांककर,
मैंने अपना एक निर्वस्त्र दर्द उठाया
झूठे सपनो के तार-तार से कपड़े पहनाये
जो बचा, उसे दुनियादारी के -
फटेहाल पैबन्दों से छिपाया
न चेहरा देखा, न रूह नापी
सिर्फ़ एक एहसास पर कि
एक दिन मेरे दायरों से निकल कर
कहीं एक ग़ज़ल की खुली साँस लेगा ,
उसे दफ़न कर दिया ,
डायरी के मटमैले पन्नो पर ...

Tuesday, July 7, 2009

हा! कैसा छद्म जीवन ?


मुस्कानों के मुखोटे
अठठासों के लिबास
वस्तुतः रुदन -
हा! कैसा छद्म जीवन ?



विरल सुख, गहन दुःख
फ़िर भी शांत मुख,
नित्य अभिनय नूतन,
हा! कैसा छद्म जीवन ?



दृष्टिगोचर कलरव,
रश्मि का उत्सव,
पर सत्य, निशा-क्रंदन
हा! कैसा छद्म जीवन ?



रिश्तों की भीड़,
सह एकाकी पीर,
मुक्ति या बंधन
हा! कैसा छद्म जीवन ?



दायित्वों के बोझ,
इच्छाओं का रोष,
पर रुग्ण तन -
हा! कैसा छद्म जीवन ?



धर्म की सोच,
कर्म का बोध,
कहाँ मुक्त मन?
हा! कैसा छद्म जीवन ?



गतिमान तन,
आशावान मन,
सत्य मृत्यु या चेतन
हा! कैसा छद्म जीवन ?

Tuesday, June 30, 2009

मानव न बन पाओगे


स्मृतियों में सजग रहे स्वर्ग-नर्क की परिणति,
पाप-पुण्य से रंजित रहती मेरे कर्मो की गति ,
तेरे भी तो कर्मो का कोई लेखा-जोखा होगा -
रह-रहकर तुने भी तो अपने अन्यायों को जोड़ा होगा

चैन के नीद क्या तू सोता होगा दैव हमारे लिखकर
कष्टों के अम्बार लगाए तुने मानव जीवन पर
हमारी भाग्याख्या को तुने क्या फ़िर से वांचा होगा ?
अपनी त्रुटियों को क्या तुने फ़िर ख़ुद ही जांचा होगा ?

अपने लिखे भाग्य ख़ुद ही पर अजमा कर देखो।
पल भर मानव जीवन में तुम आकर देखो ...
प्रभु हो ! सब कुछ तुम कर जाओगे पर -
तुम पल भर भी मानव न रह पाओगे

Tuesday, June 23, 2009

मोक्षपान



झंझावातों के आँगन
तिनको के मकान ।
संघर्ष ही प्रधान या -
पलायन समाधान।
लक्ष्य को निर्वासन,
समर्पण के विकल्प ।
प्रयास सभी व्यर्थ,
क्या दीर्घ क्या अल्प ।
किसका हो आवाहन?
किसको दे हविस ?
किसका हो चरण वंदन ?
किसका लें आशीष ?
जीवन दिग्भ्रमित ,
मृत्यु रक्तरंजित...
कैसे हो मोक्षपान ?
पात्र सभी पतित ।

Tuesday, June 16, 2009

गुमनाम ही रहने दो, ज़िन्दगी के सफे


गुमनाम ही रहने दो, ज़िन्दगी के सफे।
कहीं फ़साने तारीख न बन जाएँ
माना मुझे आग से खेलने की आदत,
डर है कि कहीं दामन उसका न जल जाएँ

ज़ार-ज़ार हैं जिगर कुछ इस कदर अपना,
छूने से ही कहीं ज़र्रा-ज़र्रा न बिखर जाएँ
माना मुझे तुफानो को आजमाने की आदत,
डर है कि झोंका कोई उसतक न पहुँच जाएँ
गुमनाम ही ....

तंज़ के नश्तर भी मुबारक हैं मुझको,
ज़ख्म दर ज़ख्म हैं पाला मैंने उनको
माना मुझे नासूर रखने की ही आदत,
डर है कि शिस्त कहीं उसको न चुभ जाएँ
गुमनाम ही ...

क्या गम जो एक और नाम दे मुझको ज़माना,
उठे मेरे नाम पर फ़िर एक और फ़साना -
माना मुझे हर ज़ुबाँ पर रहने की हैं आदत,
डर है कि नाम कहीं उसका न निकल आए
गुमनाम ही ....

(१९९६ में रचित, अपनी एक पुरानी डायरी से)

Thursday, February 12, 2009

तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई

मित्रो,
इस कविता की रचना मैंने सन् २००० के अन्तिम मॉस में अपनी अर्धांगिनी के लिए की थी। और यह कविता आज भी मेरे दिल के करीब हैं।

तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई।
प्रेम, सिर्फ़ रुदन ही नहीं उल्लास भी हैं ।
प्रेम खोने का डर नही, पाने की प्यास भी हैं।
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई ।

मैं तो जी रहा था, शुष्क जीवन मरुथल में।
मृग मारिचिकाओं के मोह से आहात पल-पल में।
तुम सावन की पहली बदरी बन जीवन पर छाई।
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई .

जीवन भोर पर, निशा निवास था चिर स्थाई ।
हर्ष ज्योत्सना खंड-खंड, तिमिर सघन प्रचंड ।
तुन, उषा की प्रथम रश्मि बन जीवन में आई।
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई ।

भय के धूमल अंधड़ में, छूट रही थी सांसो की माला।
सूना सूना ही था, जीवन में खुशियों का प्याला।
तुम, सोम-सुधा की मृदुल फुहारबन जीवन पर छाई।
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई .

तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई।
प्रेम, सिर्फ़ रुदन ही नहीं उल्लास भी हैं ।
प्रेम खोने का डर नही, पाने की प्यास भी हैं।
तुमने मुझे प्रेम की नयी परिभाषा सिखाई ।

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