पुकारा मुझे, तेरा नाम लेकर।
टटोला गया फ़िर से वो रिश्ता,
जो रह गया था गुमनाम होकर।
चुपचाप निकल आई थी आगे
यह बदनाम ज़िन्दगी मेरी
छोड़कर उजियारे दिन तेरे
लेकर अपनी रातें घनेरी ।
स्याह रात की इस चादर में,
ना थी कभी कोई उम्मीद मुझे।
सहलायेगा इस कदर -
मेरा बेचैन साया उठकर मुझे।
एक हसरत जो मैं समझा था कि
दफन आया हूँ तेरे दर पर कहीं।
रूह से लिपटकर साथ चली आयी हैं,
अब सुनाती हैं रोज एक कहानी अनकही।
बढ़िया !
ReplyDeleteघुघूती बासूती
अच्छा लिखा है .. बधाई।
ReplyDeleteएक हसरत जो मैं समझा था कि
ReplyDeleteदफन आया हूँ तेरे दर पर कहीं।
रूह से लिपटकर साथ चली आयी हैं,
अब सुनाती हैं रोज एक कहानी अनकही।
-बहुत खूब!!